गुरुवार, जुलाई 19, 2007

पुर्ची से चावल तक (प्रथम भाग)

सूक्ष्म रूप धरि
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आत्मनिर्भरता पर विश्वास रखने वाले भारतीयों पर यदि शोध किया जाये जो मेरे बचपन के मित्र लक्ष्मी प्रसाद का नाम उस शोध पत्र में शायद सबसे ऊपर आयेगा.
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लक्ष्मी प्रसाद मेरे साथ हाई स्कूल में पढ़ता था. अगर हम ‘आधुनिक’ दौर के किसी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ रहे होते तो शायद लक्ष्मी को प्यार से ‘लक्खी’ कह कर बुलाते. लेकिन पुराने ज़माने के अपने स्कूल में हम उसे लच्छू कह कर बुलाते थे.
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लक्ष्मी प्रसाद या लच्छू को अपने नाम के अनुरूप, लक्ष्मी मैया का प्रसाद पूर्ण रूप से प्राप्त था. वो ऐसे, कि लच्छू के पिता जी श्री लक्ष्मी नारायण जी हमारे शहर के रजिस्ट्रार ऑफिस में बड़े बाबू थे. सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक बड़े बाबू (लच्छू के बाऊ जी) पर धन लक्ष्मी की अविरत वर्षा होती रहती.
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हमारे एक सहपाठी (और अब हमारे पड़ोसी) राजेश बाबू ने एक दिन ख़ुलासा किया कि लच्छू के बाऊ जी की पैंट शहर में केवल एक ही दर्जी सिल पाता है. हम सबने बड़े अचरज के साथ पूछा कि भैया ऐसा क्या है उनकी पैंट में कि शहर के बाक़ी दर्ज़ी उनकी पैंट ही नहीं सिल पाते हैं? तो उस पर राजेश बाबू ने बताया कि दिन भर बाऊ जी पर घनघोर धनवर्षा होने के कारण शाम तक ऐसी मोटी रकम जमा हो जाती है कि उसको रखने के लिये साधारण दर्ज़ियों द्वारा सिली गयी पैंटॉं की जेबें बहुत छोटी पड़ती हैं और इसी लिये बाऊ जी की विशेष पैंट जिसकी दाहिनी जेब घुटनों तक लम्बी होती हैं, शहर में केवल एक ख़ास दर्ज़ी ही सिल पाता है.
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राजेश बाबू ने तो उनकी जेबों के नाम भी रखे थे. दाहिनी जेब, जिसमें बाऊ जी दिन भर की मेहनत की कमाई जमा करते थे, उसका नाम था ‘लेना बैंक’ और बाईं जेब जिसमें से निकाल कर पैसे खर्च किये जाते थी उसका नाम था ‘देना बैंक’. राजेश बाबू के अनुसार दोनों जेबों में हाथ डालते समय बाऊ जी के चेहरे पर अलग अलग टाइप के भाव भी आते थे, जैसे कि ‘देना बैंक’ से पैसे निकालते समय उनके चेहरे पर ‘देवानंद’ का भाव दिखता था और ‘लेना बैंक’ में पैसा जमा करते हुये उनके चेहरे पर ‘लेवानंद’ के भाव हुआ करते थे. बाऊ जी को अपनी बाईं जेब से रोकड़ा निकालना बिलकुल भी पसंद नहीं था और उनको इससे जुड़े भाव और उस भाव के नाम ‘देवानंद’ से ऐसी चिढ़ थी कि बाऊ जी ने ताउम्र देवानंद की कोई भी फिल्म नहीं देखी. ऐसी मान्यता है कि बाऊ जी अकसर ये कहा करते थे कि यदि देवानंद के भाई विजय आनंद और चेतन आनंद अपना नाम बदल कर लेवानंद रख लें तो वो उनकी फ़िल्म कम से कम आठ दस बार अवश्य देखेंगे.
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लेकिन साहब हमारे मित्र लच्छू की भी दाद देनी पड़ेगी, ऐसे संपन्न और आर्थिक रूप से सुदृढ़ परिवार में लालन पालन होने के बावजूद भी वह समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता था और पिता की छत्र छाया से दूर आर्थिक, वैचारिक और शैक्षिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहता था. अपनी इस आत्मनिर्भरता के चिह्न उसने हाई स्कूल से ही दिखाने शुरू कर दिये.
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जव स्कूल से सारे लड़के खर्चे के लिये घर से ही पैसे माँगते थे, लच्छू अपने पैसे खुद कमाता था. स्कूल खुलने पर जब बाऊ जी नयी कॉपी-किताबें खरीदने के लिये लच्छू को पैसे देते तो वह नयी की जगह पुरानी किताबें खरीद लेता और बचे हुये पैसों से अपना दैनिक निर्वाह करता.
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हर शुक्रवार को हाजिरी के रजिस्टर में लच्छू के नाम के आगे मास्साब अपनी लाल पेन से, बिना उसका नाम बुलाये ही ‘अ’ यानि कि अनुपस्थित लिख दिया करते थे. वो बात असल में ये थी कि आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु हर शुक्रवार को, जब शहर के टॉकीज में नयी फ़िल्में रिलीज होती थीं तो लच्छू स्कूल से ‘अ’ होकर लालजी चित्र मंदिर, राजकमल चित्र मंदिर या उत्तम टॉलीज में ‘उ’ यानि कि उपस्थित होकर सिनेमा के टिकटों का ‘पाँच का दस – पाँच का दस’ करते हुये अपने दैनिक व्यय का प्रबंध कर रहे होते थे.
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वो भी क्या दिन थे साहब, जब सिनेमा की टिकटें ब्लैक में बिका करती थीं. बीबी पर एक्सट्रा इंप्रेशन डालते हुये लोग कैसे सीना फुला कर बोलते थे कि प्रिये मैंने तुम्हारे लिये ब्लैक में टिकट खरीदे हैं. पिछली लाइन के हैं – ठीक पंखे के नीचे के. आजकल ऐसा बोल कर देखिये, प्रिये तो प्रेत बन कर आप के ऊपर झपटती हुयी बोलेंगी कि मूढ़ हो जो ब्लैक में खरीदा है, ऑन लाइन बुक करवा लेते तो पैसे बचते ना! कसम से इस मल्टीप्लेक्स कल्चर ने तो सिनेमा से रोमांस ही उड़ा दिया है.
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खैर, तो इस प्रकार लच्छू ने हाई स्कूल से ही आत्मनिर्भरता का रास्ता पकड़ लिया था. यह आत्मनिर्भरता मात्र आर्थिक मामलों तक ही सीमित नहीं थी. शैक्षिक रूप से भी लच्छू ने, स्कूल के मास्साब या ट्यूशनों से दूर, प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के लिये अपने ही प्रबंध किये थे. किसी भी महान व्यक्ति की तरह लच्छू को विद्यालय के औपचारिक और घुटन भरे वातावरण से उतनी ही चिढ़ थी जितनी कि समाजवादियों को संपन्नता से होती है.
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इधर ब्लैक बोर्ड पर मास्साब चाहे जो भी पढ़ा रहे हों, पंखे के नीचे वाली डेस्क पर बैठ कर लच्छू आगामी परीक्षा के लिये खर्रे या पुर्चियाँ बना रहा होता था. एक बार हमने पूछा कि गुरू लच्छू इम्तहान तो अभी बहुत दूर हैं तुम अभी से खर्रे बनाने में लगे हो! तो लच्छू ने हम कमअक्लों को चुप कराते हुये कहा,” एक ही जादू, कड़ी मेहनत, दूर दृष्टि, पक्का इरादा और अनुशाषन.” हम सब ठहरे मूढ़ तो लच्छू से पूछ बैठे कि भैया ई का मतलब का है? तो लच्छू ने विस्तार से बताया,” मेरे पास ‘दूर दृष्टि’ है जिसके चलते मैं भविष्य में आने वाली आपदा यानि कि परीक्षा नाम के संकट को देख सकता हूं, लेकिन मैं ने ‘पक्का इरादा’ किया है कि मैं ‘अनुशाषित’ रूप से और अभी से ‘कड़ी मेहनत’ करूँगा ताकि इस आपदा को पराजित करके विजयी हो सकूँ – यही ‘एक जादू’ है जो चलेगा. मैं तो स्कूल खुलते ही पुर्चियाँ बनानी शुरू कर देता हूँ, कभी घर चलो तो अपना कलेक्शन दिखाऊँ.” हम सब ने एकमत हो कर लच्छू से कहा कि भैया तुम कांग्रेस पार्टी में भर्ती हो जाओ – भविष्य सुनहरा हो जायेगा (उसका नहीं, कांग्रेस का !). साथ ही हमने उसके घर का रुख भी कर लिया ताकि हम उसका कलेक्शन देख सकें.
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लच्छू के घर पर हमने उनका खर्रों और पुर्चियों का कलेक्शन देखा जो कि लच्छू ने बहुत ही आर्गेनाइज़्ड तरीके से जूते के पुराने डिब्बों में सहेज कर रखा हुआ था. विषयानुसार हर डिब्बे की कलर कोडिंग थी, जैसे कि विज्ञान का डिब्बा लाल, जीव विज्ञान का पीला – वगैरह वगैरह. डिब्बे के अंदर, हर एक पाठ की पुर्चियों को अलग रखने के लिये लच्छू ने गत्ते के टुकड़े इस्तेमाल किये थे. हमने अचरज से पूछा कि भाई इतने छोटे छोटे पुर्चों में तुमने इतने डीटेल में कैसे लिख मारा? तो लच्छू ने ज्ञान दिया,” यार इतना छोटा छोटा लिखना भी एक कला है. मैं अपनी फाउंटेन पेन का चयन बहुत ध्यानपूर्वक करता हूँ. सबसे महीन चलने वाली पेन खरीदता हूँ और फिर उल्टी निब से लिख कर यह सब खर्रे बनाता हूँ.” हमने तो दाँतों तले उंगली दबा ली और श्रद्धापूर्वक लच्छू के सामने नतमस्तक हो गये. अभी हम नतमस्तक ही थे कि राजेश बाबू ने सवाल दागा,” लच्छू यार, ये सब खर्रे तो तिमाही इंम्तहान में ही यूज़ हो जायेंगे, तो फिर छमाही और फाइनल इम्तहान के लिये क्या फिर से पुर्चे बनाओगे?”
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हमारी मूढ़ता पर झुंझलाते हुये लच्छू बोला,” अरे नहीं यार! इतनी मेहनत से बनाये हुयी पुर्चियों को मैं वेस्ट नहीं करता हूँ. जब इक्ज़ाम देने जाता हूँ तो इन पुर्चियों को जहाँ तहाँ अपने ऊपर छिपा कर ले जाता हूँ. इक्ज़ाम हॉल में जब पेपर मिल जाता है तब देखता हूँ कि कौन-कौन से सवाल फंसे हैं, फिर थोड़ी देर बाद पेशाब करने के बहाने से टायलेट जाता हूं और जो भी सवाल नहीं फंसे होते हैं, उनके खर्रे वहां रोशनदान के नीचे एक ईंटे के नीचे छिपा आता हूँ. इक्ज़ाम के बाद उसे वहाँ से उठा कर फिर से बक्से में सहेज कर रख लेता हूँ.”
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इसके बाद लच्छू ने हमको अपनी दूरदर्शिता का ऐसा नमूना दिखाया कि हम तो दंग ही रह गये. उसने हमें सैंडिल के तलुए के आकार में कटे हुये कुछ खर्रे दिखाते हुये कहा,” ये देखो ! ये है मेरा बह्मास्त्र ! इन पर्चों पर वेरी वेरी इंपार्टेंट टाइप के सवालों के जवाब लिखे हैं, जो कि इम्तिहान में जरूर फंसेंगे. ये पुर्चियाँ तिमाही या छमाही इक्ज़ाम के लिये नहीं हैं. इनका इस्तेमाल सिर्फ़ फाइनल इक्ज़ाम में होगा, क्योंकि इनको रि-सायकिल नहीं किया जा सकता.”
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”रि-सायकिल ? ! मतलब ? ! और भाई ये सैंडिल के तलुए के आकार की क्यों हैं?”
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लच्छू ने बताया,” जब इक्ज़ाम हॉल में पहुंच जाऊंगा तो इन खर्रों को लेई लगा कर अपनी सैंडिल के नीचे चिपका लूँगा और फिर सीट पर बैठ जाऊँगा। पेपर मिलने के बाद देखूँगा, अगर क्वेश्चन फंसा है तो सैंडिल उतार कर उसे अपनी कॉपी के नीचे छिपा कर जवाब टेंप दूँगा और अगर क्वेश्चन नहीं फंसा है तो सैंडिल को जमीन पर रगड़ रगड़ कर सारे सुबूत मिटा दूंगा।” .

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लच्छू भैया से हम भी पूछ बैठे,” यार तुम तो पूरी की पूरी किताब को बजरंग बली की तरह सूक्ष्म रूप धारण करवा कर इम्तिहान में ले जाते हो. ये बताओ कि इसे छिपाते कहाँ हो और ये कैसे पता करते हो कि कौन सा चैप्टर कहाँ छिपाया है.”
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”यार छिपाने की तो बहुत जगह हैं, जैसे कॉलर के नीचे, कमीज के नीचे जो तुरपायी करी जाती है उसके भीतर – बत्ती बना कर. चढ्ढी के अंदर. फुल आस्तीन की कमीज की आस्तीन मोड़ कर हर एक फोल्ड में पुर्चियों की तह लगाता हूँ. रही बात कौन सी पुर्ची कहाँ है तो उसके लिये मैं एक विषय सूची बनाता हूँ और उसी हिसाब से पुर्चियाँ एडजस्ट करता हूँ. जैसे, ‘गति के समीकरण’ – बायें मोजे में, ‘न्यूटन के नियमों का सत्यापन’ – कमीज की तुरपाई में, ‘परावर्तन के नियम’ – चढ़्ढ़ी में. इस विषय सूची को मैं कॉलर के नीचे रखता हूँ और जब पेपर मिल जाता है तो विषय सूची से देख देख कर काम की पुर्चियाँ निकाल लेता हूँ.”
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मान गये ना ! !

(क्रमशः)

13 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

आपने बहुत ही प्यारा और रोचक लिखा है. धन्यवाद. इसके अगले भाग की उत्सुकता से प्रतीक्षा है

अभय तिवारी ने कहा…

बढ़िया अंदाज़ है.. बचपन के दिन की याद भी हो आई..

Shrish ने कहा…

बहुत खूब, धन्य हैं लच्छू भाई जैसे आत्मनिर्भर लोग, इसी तरह के व्यक्ति देश को आगे ले जाते हैं। :)

आगे क्या हुआ, जल्द ही बताएँ।

Isht Deo Sankrityaayan ने कहा…

बहुत ख़ूब. पढ़ कर मजा आ गया.

अतुल श्रीवास्तव ने कहा…

बहुत मजेदार लिखा है. वैसे लच्छू के बड़े भैय्या बच्चू मेरी कक्षा में हुआ करते थे. दोनों भाईयों की शक्लें ही नहीं हरकतें भी मिला करती थीं.

Manish ने कहा…

बढ़िया विवरण रहा भाई...आगे देखें ये लक्खी मियां क्या गुल खिलाते हैं।

ratna ने कहा…

दद्दा रे दद्दा, क्या कमाल के वनपीस है ापके मिस्टर लक्खी। फिर--

अनूप शुक्ल ने कहा…

वाह-वाह। बहुत खूब।

Udan Tashtari ने कहा…

चलो, बढ़िया विवरण लाये हो. अब रेग्यूलर लिखो. अगला भाग जल्दी लाओ. बैठे हैं यहीं किनारे इन्तजार में.

परमजीत बाली ने कहा…

बढिया विवरण है।

अरुण ने कहा…

गलत बात है जी इतनी मेहनतॊ आदमी को आप इस तरह पेश कर रहे हो देशके भावी कर्णधारो को इससे शिक्षा मिलेगी, कृपया इन लच्छू जी के और महान जीवन अंशो पर भी रोशनी डाले..?

manisha ने कहा…

aage kaya huya ...jaanne ki bahut utsukta hai

अफ़लातून ने कहा…

लच्छू महाराज का प्रसंग अत्यन्त प्रेरक है । साइकिल की घण्टी की कटोरी(पीतल की) बेच कर 'बोकिन' में हाथ डारे तो टिकसवा 'फिनस'। अद्धा भी ऑनलाइन थोड़ो मिलता है ।