बुधवार, जुलाई 25, 2007

पुर्ची से चावल तक (अंतिम भाग)

विकट रूप धरि
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फाइनल इक्ज़ाम में लच्छू भाई अपने सूक्ष्म रूप पुर्चियाँ ले कर पहुँच गये. हमारा सेंटर जिस कॉलेज में पड़ा था, वह कॉलेज अपनी सख़्ती के लिये बहुत मशहूर था. खास कर श्री गजेन्द्र सिंह जी के लिये. श्री गजेन्द्र सिंह जी उसी कॉलेज में अध्यापक थे और अपनी सख़्ती के लिये पूरे शहर में जाने जाते थे और इसी सख़्ती के चलते लोग उन्हें चट्टान सिंह कहते थे. अगर गजेन्द्र जी ने किसी को नकल करते धर लिया, तो भैया समझो कि वो तो गया काम से. पहले तो गजेन्द्र सिंह कॉपी में पुर्ची नत्थी करके बालक को रेस्टीकेट करते और फिर मार मार कर बालक का मलीदा बना देते. बहुत बेरहमी से मारते थे भाई!
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ख़ैर, लच्छू इतना पारंगत और आत्मविश्वासी टाइप का बालक था कि उसे पूरा भरोसा था कि चट्टान सिंह जी भी उसे धर ना पायेंगे. विधि को कदाचित कुछ और ही मंज़ूर था. एक दिन पेपर मिलने के बाद जब लच्छू ने अपनी कॉलर के नीचे उंगली घुसेड़ कर विषय सूची निकालनी चाहिये तो पाया कि विषय सूची तो नदारत थी. बेचारा घबरा गया और इधर उधर ताक तूक कर अपनी सूक्ष्म रूप विषय सूची ढ़ूंढ़ने लगा. मारे घबराहट के कभी कुर्सी के नीचे देखे तो कभी डेस्क के नीचे. उसका यह हिलना डुलना चट्टान सिंह जी को रास नहीं आया और वो पास आकर लच्छू से बोले,” क्या नाम है तुम्हारा?”
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चट्टान सिंह जी को देखते ही लच्छू की तो बोलती बंद हो गयी. जस तस बोला,” जी.. लच्छू...जी..लछमी परसाद...”
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चट्टान सिंह गब्बर के अंदाज़ में पूछे,” क्या ढ़ूंढ़ रहे हो?”
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अब लच्छू क्या बोलते. हकला कर रह गये,” जी कुच्छौ नहीं...कुच्छौ तो नहीं...”
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चट्टान सिंह जी दहाड़े,” खड़े हो जाओ !”
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लच्छू खड़े!
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चट्टान सिंह जी ने लच्छू को एक ऐसा झन्नाटेदार कंटाप रसीदा कि थप्पड़ की गूंज पूरे शहर में सुनाई पड़ी होगी. लच्छू घबराये,” हमसे का गलती हो गयी गुरू जी?”
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चट्टान सिंह जी ने कथा वाचन शुरू किया,” निकालो, कमीज की तुरपाई के अंदर से ‘गति के समीकरण’, कमीज की दाहिनी आस्तीन के पहले फोलड से ‘आपेक्षित घनत्व’, दूसरे फोल्ड से ‘परावर्तन के नियम’....”
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विकट रूप धर गुरू जी बोलते रहे और सूक्ष्म रूप धारे लच्छू का, पुर्ची निकालते निकालते, चीर हरण होता रहा और हम सब बेबस पाण्डवों की तरह यह विचलित करने वाला दृश्य, सीने पर पत्थर रख कर देखते रहे. जब विषय सूची यह बखान करने लगी कि अमुख अमुख पुर्चियों के अज्ञातवास का स्थान लच्छू की चढ़्ढ़ी के अंदर है तो हमने भी मार्मिक दृश्य देखना बंद किया और कॉपी में सिर घुसेड़ कर अपने जवाब लिखने लगे.
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बेचारा लच्छू.
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ये तो कहिये कि लच्छू के बाऊ जी ने एक बार चट्टान सिंह जी का कोई काम बिना सुविधा शुल्क लिये ही करवा दिया था, जिसके चलते लच्छू रस्टीकेट होने से तो बच गये लेकिन चट्टान सिंह जी के कोप से ना बच पाये. बेचारा लच्छू इतनी बुरी तरह पिटा कि शाम को साइकिल चलाने लायक भी ना रहा. ये तो भला हो राजेश बाबू का, जो कि बचपन से ही दूसरों की मदद करते आये हैं, कि उन्होंने लच्छू को अपनी सायकिल के डंडे की सवारी करवाते हुये उसे घर छोड़ा. सारे रास्ते बेचारा कराह रहा था – हाय मार डाला – चट्टान तू चूरन बन जाये – ना जाने क्या क्या बद-दुआयें दे रहा था.
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उसकी पीड़ा देख कर राजेश बाबू द्रवित होते हुये बोल दिये,” लच्छू, तुम चिंता मत करो! कल सुबह हम तुमको सायकिल पर बैठा कर सेंटर ले भी जायेंगे और वापसी में छोड़ भी देंगे.”
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दूसरे दिन लच्छू को बैठाने के लिये राजेश बाबू ने सायकिल के कैरियर पर गद्दी-वद्दी भी बाँध दी ताकि लच्छू आराम से बैठ कर जा सके. रास्ते में हमने देखा कि कैरियर पर बैठे हुये लच्छू भैया, आराम से सूक्ष्म रूप पुर्चियों को अज्ञातवास देने में लगे हुये हैं. मैं ने कहा,” अबे तुमको डर नहीं लगता है क्या! कल पकड़े गये, रस्टीकेट होते होते बचे, जम कर तुड़ैया हुयी तुम्हारी और आज फिर पुर्ची ले कर चल पड़े. पगला गये हो क्या?”
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लच्छू चिड़चिड़ा कर बोला,” अबे अकल से पैदल हो क्या ? हैं ?! कल ही पकड़ा गया हूँ और कस कर लात जूते भी खये हैं, तो लोग तो यही सोचेंगे ना कि मैं डर के मारे आज ‘साफ़-सुथरा’ आया होऊँगा, और मैं सबको चकमा दे कर अपना काम कर निकलूँगा.”
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खैर, पेपर बंटते ही चट्टान सिंह जी फिर से कमरे में आये और लच्छू की सीट के चारों ओर दो बार परिक्रमा करते हुये बोले,” लछमी परसाद...”
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”जी मास्साब !” लच्छू बिना घबराहट और हकलाहट के बोला.
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”आज भी कुछ खर्रा-वर्रा लाये हो क्या?”
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”नहीं गुरू जी, कल की मार के बाद कौन ऐसा बावला होवेगा जो फिर से खर्रा लाने की हिम्मत करेगा. अब तो मैं सारी ज़िंदगी खर्रे ना लिखूँगा गुरूजी. आपने मुझे सच्चाई का रास्त दिखा दिया है – उसी पर चलूँगा.”
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चट्टान सिंह जी प्रसन्न हुये और लच्छू के सिर पर हाथ फेर कर उसे आशीष देते हुये कमरे से बाहर जाने लगे. दरवाजे पर पहुंच कर चट्टान सिंह जी ने ‘रियलाइज़’ किया कि लच्छू के बालों से कोई चीज़ उनकी उंगलियों में फंस गयी है. चट्टान सिंह जी ने फंसी चीज को देखते हुये बोलना शुरू किया,” बायें मोजे में – ‘बालक शब्द का रूप’, कॉलर के नीचे ‘फल शब्द का रूप’, चढ़ढ़ी के अंदर ‘दीर्घ संधि’, सैंडिल के नीचे ‘मारीच उवाच का हिन्दी अनुवाद’.....”
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फिर बेचारे लच्छू की जो हालत हुयी उसे अगर यहाँ बता दिया तो मानव अधिकार संरक्षक पक्के तौर पर चट्टान सिंह जी को काला पानी की सजा करवा देंगे. इतना बता देता हूँ कि बेचारा कैरियर की सवारी करने लायक भी ना रहा और शाम को हमने उसे जस तस रिक्शे के पावदान पर ठेल कर उसे उसके घर कूरियर कर दिया.
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चलिये, इतनी रुकावटों के बावजूद लच्छू भैया ने गुड सेकंड क्लास में हाई स्कूल निपटा दिया. केवल 12 नम्बरों से उसकी फ़र्स्ट क्लास रुक गयी. कभी कभार बेचारा दुखी हो जाता और दिल भर आता तो सेंटी हो कर बोलता कि अगर चट्टान सिंह जी थोड़ा कोओपरेट किये होते तो मैं भी फ़र्स्ट क्लास में हाई स्कूल निकालता.
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इंटर करते हुये जब अधिकतर लड़के आई.आई.टी., रुढ़की, बिट्स मेसरा, एस.सी.आर.ए., धनबाद या टी.एस.’राजेन्द्र’ की प्रतियोगात्मक परीक्षाओं के फार्म भर रहे थे तो लच्छू जी ने आकर सवाल उठाया,” ये सब क्या भर रहे हो?”
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जब हमने एक्सप्लेन किया तो लच्छू बोले,” ये सब पढाई करके और नौकरी करके क्या उखाड़ लोगे? क्या 1200 – 1500 की प्राइवेट नौकरी करके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो पाओगे? नौकरी तो ऐसी होनी चाहिये जिसमें आपको सैलरी के लिये सरकार का मुँह ना ताकना पड़े. आप खुद ही पैसे खड़े कर लें.”
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हमने पूछा,” जैसे....?”
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” जैसे भाई जल निगम, सिंचाई विभाग, नगर निगम, पी. डब्लू. डी. और हाँ, यहाँ भी इंजीनियर बनने में कोई फायदा नहीं है इसलिये मैं तो पालीटेक्निक का फार्म भरूंगा और ओवरसियर बनूँगा. आत्मनिर्भरता ही मेरा नारा है.”
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खैर, इंटर के बाद ज्यादा तर लड़के अपने अपने रास्ते चले गये और लच्छू से उसके बाद कोई संपर्क नहीं रहा. उसकी आत्मनिर्भरता की बातें अकसर याद आती रहतीं.
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पिछले माह मुंबई जाना हुआ. फ़ोर्ट स्थित सिटी बैंक के ए.टी.एम. से पैसे निकाल कर निकला तो एक खोमचे पर नज़र पड़ी – ‘चावल के दाने पर नाम लिखवाइये’. खोमचे पर पहुँच कर मैं ने कहा,” भाई, मेरा भी नाम लिखना ‘अनुराग’.” जब कारीगर पर नज़र पड़ी तो चेहरा जाना पहचाना लगा मैं ने तुक्का लगाया,” लच्छू?”
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थोड़ी देर मुझे देखते रहने के बाद लच्छू भी पहचान गया और बोला,” देखो, बचपन में उल्टी निब से छोटा छोटा लिखने का जो गुर सीखा था वो आज कैसे मेरी जीविका बन गया है. अपनी शर्त पर रहते हैं, जब मन आया खोमचा लगाया और जब मन आया उठाया – पूर्णतया आत्मनिर्भर. लाइफ़ हो तो ऐसी.”
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और इस बार भी मैं लच्छू के आत्मनिर्भरता के विचारों के सामने नतमस्तक हुये बिना ना रह पाया.

7 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

गजब है भाई

बेनामी ने कहा…

gajab hai bhai.

Udan Tashtari ने कहा…

वाह भई लछ्छू. आत्म निर्भरता का सिद्धांत जिन्दगी भर नहीं छोड़ा. आपके संपर्क सूत्र भी काफी विस्तृत हैं भाई, साधुवाद.

मास्साब चट्टान सिंग से फिर कभी मिलना हो पाया क्या? :)

अरुण ने कहा…

कृपया अब आप लच्छू सिंह् की मदद करे. कम से कम उसे खर्रे कैसे बनाये विषय पर उससे दो चार कालिजो मे लेक्चर ही दिलवा दे ,अगला कल फिर से नये युग का सुत्रधार कर लेगा और आपको छात्र दुआये देगे

नाम में क्या रखा है? ने कहा…

दूसरा भाग पहले से भी ज्यादा मजेदार है

परमजीत बाली ने कहा…

बहुत बढिया!

Shrish ने कहा…

च च, कॉमेडी मूवी का कैसा ट्रैजिक अंत हुआ। आपने पता किया कि लच्छू ओवरसियर काहे नहीं बन पाया?