गुरुवार, जुलाई 12, 2007

हम दो, हमारे सौ


पश्चिमी देशों ने भी क्या क्या चोचले बनाये हुये हैं. अब यही देखिये आज विश्व जनसंख्या दिवस है. सुन कर ही बच्चन जी की मधुशाला याद आ गयी;
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एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला
एक बार ही लगती बाजी जलती दीपों की माला
दुनिया वालों किंतु किसी दिन आ मदिरालय में देखो
दिन को होली रात दीवाली रोज़ मनाती मधुशाला
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अब जनसंख्या का मुद्दा कोई होली, दीपावली या किसी का बर्थ डे तो है नहीं कि साल में एक ही दिन मनाया जाये। इन मुद्दों पर तो रोज ही सोचना पड़ेगा. पर भैया कौन समझाये इन मानसिक रूप से कंगाल गोरों को, कहते हैं कि साल में एक दिन मनाओ एड्स दिवस, विश्व शांति दिवस, जनसंख्या दिवस और ना जाने क्या क्या !
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इन कमअक्लों को हमसे कुछ सीख लेनी चाहिये। हमारे लिये तो जीवन एक उत्सव है और हम हर रोज जश्न मनाते हैं. हमें किसी ‘दिवस’ की जरूरत नहीं पड़ती और अगर कोई जश्न किसी दिवस का मोहताज है भी तो हम मधुशाला का रुख करते हुये दिन को होली और रात दीवाली मना लेते हैं, मतलब कि नॉन स्टॉप जश्न 24/7 एन.डी.टी.वी. की तरह.
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अब यह जनसंख्या को ही ले लीजिये, बताइये क्या हम किसी दिन का इंतज़ार करते हैं ? नहीं भाई बिलकुल नहीं, जब और जहाँ मौका मिला हम जागरूक नागरिकों की तरह जनसंख्या बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे ही देते हैं।
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प्रश्न यह उठता है कि जनसंख्या के प्रति हम देसी इन गोरों से इतने भिन्न और जागरूक क्यों हैं? देखिये, कई बातें हैं जैसे कि हमारा ईश्वर में आस्था रखना, बड़ों की आज्ञा का पालन करना और हमारा अपने देश, समाज और अपने परिवार के प्रति अपना उत्तदायित्व समझना।
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हम लोग धर्म और ईशवर में अटूट बिश्वास रखते हैं ! रोज सुबह शाम आरती गाते हैं, मंगलवार का व्रत रखते हैं, मंगल और शनिवार को बजरंग बली के मंदिर में सवा किलो बेसन के लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं, देवी जागरण करवाते हैं, साल में एक या दो यात्रा शिरडी या वैष्णो देवी की करते हैं, तिरुपति में बाल मुडवाते हैं और इन सब का परिणाम यह होता है कि ईश्वर हमारी अटूट श्रद्धा से प्रसन्न हो कर हमको प्रसाद के रूप में नवजात शिशु दे देता है. आखिरकार, बच्चे तो भगवान की देन होते हैं ना !
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तो भाई जनसंख्या बढ़ाने के पवित्र काम में ईश्वर की भी बड़ी अनुकंपा है.
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इस पुण्य कर्म में ईश्वर के अतिरिक्त हमारे बड़े – बुजुर्ग भी हमारे साथ हैं। इधर नयी नवेली बहू ने ससुर जी के चरण स्पर्श किये और उधर ससुर जी ने हाथ उठाते हुये आशीष दिया “दूधो नहाओ, पूतों फलो”. इतना सुन कर सासू माँ कैसे पीछे रहें वो भी बहू को आशीष देती हैं “तुम्हारी गोद सदा हरी रहे, ईश्वर तुमको इतने बच्चे दे कि रात को गिन कर सोन पड़े”. अब जब बड़ों की यह इच्छा हो तो भाई नव विवाहित जोड़ी को पालन तो करना ही पड़ेगा !
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एक और बात है हमारे जागरूक होने की और वह है परिवार और समाज के प्रति हमारा उत्तरदायित्व। इसको समझने के किये मैं एक केस स्टडी नीचे दे रहा हूँ.
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हमारे घर में चौका-बर्तन करने के लिये सुषमा आती है। सुषमा को कुल मिला कर आठ बार ईश्वर का प्रसाद प्राप्त हुआ है. सबसे बड़ा प्रसाद यानि कि संतान 22 वर्ष की है और सबसे छोटी 22 महीने ही. सुषमा बहुत ही समझदार टाइप की महिला है और उसने बहुत ही सुनियोजित तरीके से अपना परिवार नियोजन या फैमिली प्लानिंग करी हुयी है.
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उनके हर बच्चे के बीच कोई एक या डेढ़ साल का अंतर है. जैसे ही संतान 16 साल की हुयी, सुषमा उसे चौका-बर्तन के काम पर लगा गेती है, 2 साल बाद उसकी शादी हो जाती है लेकिन तब तक अगली संतान शादी करने वाली संतान को ‘रिलीव’ करने के लिये तैयार हो जाती है. इस प्रकार ‘नॉन स्टॉप’ सप्लाई का चक्र चलता रहता है और सुषमा हर डेढ़ दो साल पर एक नये शिशु को जन्म दे कर यह पक्का कर लेती है कि उसके परिवार आय लगातार बंधी रहे. इसे कहते हैं परिवार नियोजन या फैमिली प्लानिंग !
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ये तो था सुषमा का पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाना. लेकिन उसकी यह प्लानिंग मात्र उसके परिवार तक ही सीमित नहीं है. सुषमा का यह मानना है कि ‘साहिब’ लोगों के घर पर चौका-बर्तन करने वाली सस्ती, मजबूत और टिकाऊ कामवालियाँ लगातार आती रहें, इसके लिये भी वह संतान को जन्म देती है. यह रहा सुषमा का सामाजिक उत्तरदायित्व समझना.
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इसके अतिरिक्त हम संपूर्ण विश्व के भविष्य के प्रति भी बहुत जागरूक हैं। हम यह बात समझ चुके हैं कि विश्व के बहुत से देशों की जनसंख्या कम हो रही है और बची-खुची जनसंख्या वृद्धावस्था की कगार पर खड़ी है. ऐसे में आज से कुछ साल बाद उनके देश में काम करने के लिये वर्क फ़ोर्स दे सकने वाला एक मात्र हमारा हे देश होगा. हम अपने नागरिकों से उन देशों को सुचारु रूप से चलायेंगे. सारे विश्व में अपने झंडे गाड़ेगे. इससे सारे विश्व का भला होगा साथ ही साथ रेमिटेंस से भेजे गये पैसों से भारत का विदेशी मिद्रा भंडार भी बढ़ेगा. देखा, कैसे देश सेवा और विश्व सेवा एक साथ चलेगी.
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आप गोरों की इन बचकाना ‘दिवस’ वाली फिलॉसफी पर मत जाइये। साल भर जनसंख्या दिवस मनाइये. विश्व, देश, राष्ट्र, समाज और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को एक सच्चे भारतीय की तरह निभाइये.
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आइये, जनसंख्या बढ़ाइये!
मेरे साथ नारा लगाइये !!

हम दो, हमारे सौ

5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

बाकिया तो सब समझ गये. हंस भी लिये. सुषमा देवी को आठ बार प्रसाद प्राप्त हो चुका, जानकर प्रसन्न भी हुये. सबसे बड़े प्रसाद की उम्र भी जान गये यानि बड़े ध्यान से पढ़ा. अब अपने इस कथन का जरा खुलासा करें:

जब और जहाँ मौका मिला हम जागरूक नागरिकों की तरह जनसंख्या बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे ही देते हैं।


-उत्तर जानने की उत्सुकता लगी है. जरा विस्तार में खुलासा किया जाये. टालम टुल्ला जबाब निरस्त माना जायेगा. :)

mahashakti ने कहा…

अच्‍छा लिखा है।

आम तौर पर धारणा थी कि बच्‍चे भगवान की देन होते है अब यह धारणा बदल नही है, अब तो वे भगवान के कम खुदा के देन ज्‍यादा है :)

Shrish ने कहा…

जी अभी हमारी शादी तो हुई नहीं, हम कुंवारे भी किसी तरह योगदान दे सकते हैं क्या?

rajeshgupta ने कहा…
इस टिप्पणी को एक ब्लॉग व्यवस्थापक द्वारा हटा दिया गया है.
अतुल श्रीवास्तव ने कहा…

कटु सत्य. पढ़ कर रोना आ गया.