सोमवार, जुलाई 09, 2007

मांस – मदिरा

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कोई चार सप्ताह
पहले आधिकारिक कार्यवश वियतनाम जाना पड़ा. मेरे साथ चीनी मूल की एक सहकर्मी भी गयी थीं. हमारी उड़ान सिंगापुर से हनोई तक थी और फिर वहाँ से हमें कार द्वारा हाई फाँग जाना था.
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हनोई से हाई फाँग की दूरी कोई 150 किलोमीटर है और कार द्वारा करीब तीन घंटे लग जाते हैं. वितयतनाम में हमारी एजेंट हमें लेने के लिये हनोई पहुंच गई थीं और फिर उनके साथ ही हमने हनोई से हाई फाँग तक का सफर तय किया.
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भारत में जो कार यात्रायें करी थीं वो सब पुनः जीवंत हो उठीं. सड़क के दोनो ओर हरे भरे खेत, छोटे छोटे गाँव, हाई-वे के किनारे चाय की दुकानें, मुझे तो ऐसा लगा कि भारत में ही यात्रा हो रही है. मेरी सहकर्मी काफी देर तक खिड़की से बाहर देखने के बाद कहा,”अनुराग, तुम्हें आश्चर्य नहीं हो रहा है?”
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”कैसा आश्चर्य?”
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”इतने सुंदर से घर बने हैं, सामने से तो बहुत अच्छी पुताई करी गयी है, सजाया गया है लेकिन बगल की दीवारों पर प्लास्टर भी नहीं किया गया है.”
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यकीन मानिये मैं ने तो इस पर ध्यान भी नहीं दिया था. भारत में घूमते हुये मेरी आँखें इस प्रकार के घर (सामने से लिपे पुते लेकिन बगल की दीवारें बिना प्लास्टर के) देखने की इतनी अभ्यस्त हो चुकी हैं कि इस पर आश्चर्य होने का कोई प्रश्न ही नहीं था. तो मैं ने कहा,” नहीं कोई आश्चर्य नहीं हो रहा है! बहुत से देशों में ऐसे घर देखेने को मिलते हैं.”
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”इंडिया में भी...?”
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”हाँ, इंडिया में भी.” मैं ने बताया.
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”अब मुझे यह आश्चर्य नहीं हो रहा है कि तुम्हें आश्चर्य क्यों नहीं हो रहा है!”
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थोड़ी देर के बाद उन्होंने खिड़की बाहर उंगली से इशारा करते हुये फिर पूछा,” यह देख कर भी आश्चर्य नहीं हो रहा है?”
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मैं ने बाहर देखा कि उनका इशारा एक ही मोटर साइकिल पर जाते हुये तीन सवारों की ओर था. मैं ने सिर हिलाते हुये कहा,” कोई आश्चर्य नहीं! मैं ने तो एक ही स्कूटर पर पाँच लोगों का पूरा परिवार यात्रा करते देखा है, यह तो कई देशों में बहुत सामान्य सी बात है.”
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मेरे किसी भी बात पर अचंभित ना होने से लगता है कि उसे बहुत अचंभा हुआ. खैर, थोड़ी देर बाद जब हम एक छोटे से शहर से गुज़र रहे थे तो वहाँ मैं ने ऐसा कुछ देखा कि मैं ने कहा,” अब मैं भी अचंभित हूँ ...!”
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”क्या देखा तुमने?”
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मैं ने उंगली से इशारा करते हुये कहा,” वो देखो सामने...आश्चर्यजनक!”
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उसने जो देखा तो उसके मुँह से भी निकला,” हे भगवान! अद्भुत!!” सामने एक महाशय स्कूटर की पिछली सीट पर मरा हुआ भैंसा लाद कर लिये जा रहे थे. (विश्वास नहीं होता है ना!) फिर कई ऐसे दृश्य दिखे, मसलन स्कूटर पर लदे हुये पाँच या छः मरे हुये सुअर और सबसे मजेदार था एक महाशय का स्कूटर पर बड़ा वाला फ्रिज लाद कर जाते हुए दिखना.
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इन मजेदार दृश्यों को देखते हुये हम पहुँचे हाई फाँग. होटल में चेक इन करते हुये हमने अपने वियतनामी एजेंट से पूछा,” तुम भूखी होगी, तो क्यों ना हम कॉफी शॉप में कुछ खा लें.”




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उसने कहा कि हम कमरों में अपना सामान रखते हैं और फिर बाहर चल कर वियतनामी खाना खाते हैं. सामान रख कर हमारा वापस मिले और टहलते हुये एक वियतनामी रेस्टोरेंट में जा पहुँचे. मुझे ज़्यादा भूख नहीं लगी थी इसलिये मैं ने एक सलाद मंगवा लिया. क्रंची सलाद में कुछ चीज़ें तो जानी पहचानी लगीं जैसे तुलसी की पत्तियाँ, लट्यूश वगैरह लेकिन एक गुलाबी सी क्रंची और क्रिस्पी चीज जो पतली पतली पट्टियों में कटी थी और जिसे मैं ढ़ूंढ़ कर बड़े चाव से खा तो रहा था लेकिन समझ नहीं पा रहा था कि यह है क्या! खैर मैंने सारा सलाद चट करने के बाद अपने वियतनामी एजेंट से पूछा कि मोहतरमा वो गुलाबी वाली स्वादिष्ट चीज क्या थी? उन्होंने मुस्कुरा के पूछा,” तुमको पसंद आई?”
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”हुम्म, बहुत बढ़िया था!!!”
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”मुझे मालुम था कि तुमको पसंद आया होगा. मेरे सभी मेहमानों को पसंद आता है और मुझे भी बहुत पसंद है.”
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मैं ने विनम्रता से कहा,” तुमने मेरे लिये बहुत बढ़िया सलाद पसंद किया. मैं तुम्हारा बहुर शुक्रगुज़ार हूँ. लेकिन वह था क्या?”
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”सुअर के कान थे. उन्हें कच्चा ही कतर कर सलाद में डाल दिया जाता है. मुझे खुशी हुई कि तुमको पसंद आया. और मंगवाऊँ?”
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मैं ने अपनी बनावटी मुस्कान बिखेरते हुये कहा,” जी नहीं फिलहाल मुझे भूख नहीं है.”
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तो यूँ शुरू हुआ मेरा सफरनामा ! कान के कच्चे होना तो सुना था लेकिन सुअर के कच्चे कान चबाना झेल भी लिये.
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रात को हमारी आधिकारिक बैठक थी तो रात का खाना होटल में ही खाया. आश्चर्य यह हुआ कि होटल के मेन्यू में सभी पकवानों के दाम वियतनामी मुद्रा के स्थान पर अमरीकी डॉलर में लिखे थे.
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सुबह का नाश्ता भी होटल में ही किया. नाश्ते के समय वियतनामी एजेंट ने बताया कि वियतनाम की सबसे मशहूर डिश है “बीफ़ नूडल्स” और वह नाश्ते में उपलब्ध है. मैं ने घुमा फिरा कर पूछ लिया कि भाई इसमें कच्चा मांस तो नहीं होता है. जब पूरी तसल्ली हो गयी तभी मैं ने नूडल्स खाये जो कि वाकई बहुत उम्दा थे और स्वाद में सिंगापुर में मिलने वाले नूडल्स से काफी अलहदा थे.
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सुबह की बैठक के बाद, दोपहर का खाना भी होटल में ही खाया. होटल के रेस्टोरेंट में सी फूड का बुफे था और मैं ने सी फूड के प्रति कमजोरी होने के कारण बुफे चुन लिया. उम्मीद यह थी कि मछली, छींगे, केकेड़े या ऑक्टोपस वगौरह खाने में होंगे. लेकिन जब प्लेट ले कर परस रहे थे तो एक डोंगे के पास लिखा देखा “मगरमच्छ”. हम थोड़ा रोमांचित हो गये और एक छोटा सा टुकड़ा उठा लिया – वैसे स्वाद कोई बुरा नहीं था.
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मजेदार घटना हुई रात के खाने पर. रात को हमारी कोई आधिकारिक बैठक नहीं थी तो हमने होटल से बाहर जाकर वियतनामी खाना खाने का कर्यक्रम बनाया. हमारी वितयनामी मित्र हमें एक ऐसे रेस्टोरेंट में ले गयीं जहाँ सिर्फ मुर्गे के व्यंजन मिलते थे. हमने खाना मंगवाया और जब खाने का इंतज़ार हो रहा था हमारी वियतनामी एजेंट ने पूछा,” क्या तुम लोग वाइन पीना पसंद करोगे?”
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”बिलकुल, क्यों नहीं.” फिर मैं ने अपनी सहकर्मी से पूछा,” लाल या सफेद?”
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वियतनामी जी बोलीं,” यहाँ लाल या सफेद वाला मसला नहीं है. यहाँ पर इससे वाइन का चयन करते हैं कि वाइन में पड़ा क्या है. और मैं आपको आगाह कर दूँ कि यहाँ वाइन में मांस पड़ा रहता है.”
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” ये तो बहुत रोचक है. वैसे मैं तो चीनी मूल की हूँ और किसी भी प्रकार के मांस से मुझे कोई परहेज नहीं है. मैं हर चीज़ का मांस खा सकती हूँ. हाँ, अनुराग तुम बताओ कि क्या तुम मांस पड़ी वाइन पियोगे?” मेरी चीनी मूल की सहकर्मी ने बड़े आत्मविश्वास से कहा.
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मैं ने कहा,” देख कर तय करते हैं कि क्या पीना है. क्या हम वाइन की बोतलें देख सकते हैं?” मैं ने पूछा.
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हाँ, हाँ क्यों नहीं! चलो बार काऊंटर पर चलो वहीं चयन कर लेंगे.” वियतनामी जी ने कहा.
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बार पर पहुँच कर मैं ने वाइन के जो जार देखे तो चयन करना तो मेरे लिये असम्भव हो गया और मैं ने उनकी फोटो खींच ली। आप भी देखिये;



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वाइन को तेज़ करने के लिये और उसे अलग अलग स्वाद देने के लिये उसमें नाग, छिपकलियाँ, भालू का पंजा और जंगली तीतर डाले गये थे.
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वियतनामी जी ने पूछा,” अनुराग, कौन सी वाली पीना पसंद करोगे?’
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मैं ने कहा,” मैं चीनी मूल का नहीं हूँ, मैं भारतीय मूल का हूँ इसलिये मैं तो यह पीने की हिम्मत ना कर पाऊंगा.” अपनी चीनी मूल की मित्र से मैं ने कहा,” तुम चीनी मूल की हो तो मेरे ख़्याल से तुमको ये वाइन पीने से कोई परहेज नहीं होगा.”
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”अनुराग, मैं चीनी मूल की ज़रूर हूँ लेकिन मेरी पिछली कई पुश्तें सिंगापुर में ही जन्मी और पली हैं. इसलिये मेरा स्वाद और मेरी खाने की प्राथमिकतायें समय के साथ साथ बदल गयी हैं. साँप और छिपकली तो मैं भी ना ले पाऊँगी!”
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हमने वाइन पीने का मूड बदल दिया और मुर्गा खा कर लौट आये. लेकिन वियतनाम से वापस आते हुये मैं ने साँप और बिच्छू वाली वाइन की एक बोतल जरूर खरीद ली जो अभी भी मेरे पास बंद रखी है. ये देखिये;




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अगर आप लोग कभी सिंगापुर आयें तो मुझे सूचित करिये, वियतनाम की इस विशेष मधुशाला का एक प्याला आपको ज़रूर पेश करूँगा.

6 टिप्‍पणियां:

अफ़लातून ने कहा…

एक जिन्दादिल इन्सान का जीवन्त यात्रा वर्णन पढ़ कर मन गदगद हो गया। उम्मीद है ,कान कच्चे नहीं हुए!सांस्कृतिक समानतायें और विषमतायें दोनों खींचती हैं।आभार।

विजय वडनेरे ने कहा…

अनुराग जी,
वाह (सुनकर ही) मजा आ गया - सुअर के कच्चे कान और सांप-बिच्छु वाली वाईन...म्म्म्म...!!

मुँह में ज़हर (ऊप्स, आई मीन- पानी) आ गया. :)

अपन को पेलेईच्च से पता था कि आप जरुर ऐसा कुछ करोगे, इसी लिये अपन सिंगापुर से पेलेई कल्टी मार लिये.

अब तो जो भला मानुस सिंगापुर आने भी वाला होगा तो भी नहीं आयेगा - कि क्या पता अनुराग कब उसे पकड़ कर क्या खिला-पिला दे.

आपके यहाँ का तो अब पानी भी १० बार छान-फ़िल्टर और शुद्ध कर के पीना पडेगा भई. (क्या पता सांप-बिच्छु ना सही तो लोकली अवेलेबल कॉकरोच-झिंगुर ही डुबा रखे हों)

ही ही ही

Shrish ने कहा…

हे भगवान, कभी सूअर का कान, मछली, छींगे, केकड़े या ऑक्टोपस, मगरमच्छ और सांप-बिच्छू, छिपकली वगैरा वाली वाइन।

भगवान बचाए कौन से प्रकार के प्राणी हैं ये वियतनामी? इन सबसे अच्छा तो ढेंचू-ढेंचू ही था। :)

भईया हम जिंदगी में कभी आपकी तरफ आए तो अपना एक ड्रम पीने का पानी और खाने-पीने का पूरा जुगाड़ लेकर ही आएँगे।

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत खूब रही वियतनाम यात्रा. अब बोतल सहेज कर रख लो. इसी बहाने शायद जल्दी सिंगापुर आ जायें. मगर सादी वाईन भी रखे रहना भाई. अगर नहीं जमीं, तब??

अनूप शुक्ला ने कहा…

बहुत सही है। यह वाकया हमने आपसे सुना था। अब पढ़कर दुबारा मजा लिया।

उन्मुक्त ने कहा…

कई साल पहले नागालैंड जाने का मौका मिला था बाजार में मेढ़क और कीड़े मकौड़े खाने के लिये बिकते देखे थे।