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धीरे से जाना बगियन में
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गत पर्यावरण दिवस के उपलक्ष में हमारे मोहल्ले की कमेटी ने यह सोचा कि मोहल्ले के सारे बच्चों को इकठ्ठा करके उनको पर्यावरण से जुड़े हुए मुद्दों के विषय में जागरूक किया जाये. कमेटी के सदस्यों में यह सहमति बनी कि तमाम बच्चों को उन तथ्यों के बारे में अवगत कराया जाये जो कि पर्यावरण को क्षति पहुँचाते हैं तथा वैश्विक ऊष्मीकरण को बढ़ावा देते हैं.
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तमाम मुद्दों में यह भी शामिल था कि हम बच्चों को वन संरक्षण, भूमि संरक्षण, प्रदूषण नियंत्रण के साथ साथ प्लास्टिक, मोटर कारों और कारखानों से निकलने के धुंए के कुप्रभाव के बारे में भी बतायेंगे.
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इस महान कार्य को अंजाम देने हेतु तुरंत ही चार लोगों की एक समिति का गठन किया गया और मेरे अद्वितीय, अतुलनीय और प्रभावशाली व्यक्तित्व के कारण इस महत्वपूर्ण समिति में मुझे भी चुना गया. मेरे साथ संजय, राजेश बाबू और मनीष को भी चुना गया.
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हम चारों ने यह तय किया कि पर्यावरण दिवस का कार्यक्रम मोहल्ले के पार्क में रखा जाये. नगर निगम की देख रेख में होने के कारण पार्क बड़ी जीर्णावस्था में था हमने सोचा कि इसी बहाने पार्क का जीर्णोद्धार भी हो जायेगा. हम पार्क का निरीक्षण करने चल दिये. अभी पार्क के पास पहुँचे भी नहीं थे कि पार्क से उठने वाली मारक दुर्गंध ने हमें अपनी जेब से रुमाल निकाल कर अपनी नाक ढकने पर मजबूर कर दिया.
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नाक और मुँह को रुमाल से ढक कर पार्क में घुसे ही थे कि वहाँ का दृश्य देख कर राजेश बाबू तो उल्टी करते हुये बोले,” अरे यार चलो यहाँ से!”. पार्क की चारदीवारी मूत्र से गीली और उससे लगी हुयी ज़मीन मल से ढकी हुयी थी. सड़ाइंध ऐसी कि अगर मुर्दा वहाँ लिटा दो तो वो भी नाक ढक कर ऐसे भागे कि शायद ओलंपिक में भारत को स्वर्ण पदक जितवा दे.
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” बहुत बड़े पैमाने पर सफाई की ज़रूरत है!” मैं ने रुमाल के पीछे से कहा.
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” कोई बात नहीं, मेरी नगर निगम में जान पहचान है, मैं सफाई करवा दूँगा.” मनीष ने आश्वासन दिया.
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राजेश बाबू बोले,”यार फायदा क्या होगा? आज सफाई करवाओगे कल पार्क फिर ढक जायेगा.”
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अब क्या करें !? फिर संजय बोले,” ऐसा करते हैं नदीम से कहते हैं कि पार्क पर नज़र रखे और लोगों को यहाँ पर गंदगी फैलाने से रोके.”
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नदीम भाई की पंचर जोड़ने की दुकान है जो पार्क से लगी हुयी सरकारी जमीन का अतिक्रमण करके उस पर मोमजामे की छत डाल कर बनायी गयी है. मोमजामे की छत के नीचे पार्क की दीवार से निकाले गये ईंटॉं को बिछा कर फर्श बनी है जिस पर उनका हरे रंग का डीजल से चलने वाला कंप्रेसर शान से बैठा है. कम्प्रेसर से लगी एक लोहे की बाल्टी रखी रहती है जिसमें ट्यूब डुबो कर नदीम भाई पंचर ढ़ूँढते हैं. बगल में एक लंबे डंडे पर नदीम भाई की दुकान का बोर्ड और मूल्य सूची लटके हुये हैं “नदीम पंचर रिपेयरिंग कम्पनी – रेट – क़ार हवा भरवाई 5 रुपये, मोटर साइकिल 3 रुपये, स्कूटर 2 रुपये , नोट : स्टेपनी में हवा भरवाने पर 1 रुपया एक्स्ट्रा लगेगा...” आगे पंचर जोड़ने के रेट भी लिखे हैं. नदीम भाई हम मोहल्ले वालों का बहुत ख्याल रखते हैं और हमारी कार में केवल चार रुपये में हवा भरते हैं – एक रुपया डिस्काउंट और हाँ स्टेपनी में मुफ़्त में ही हवा डाल देते हैं.
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संजय की बात हमें पसंद आयी और हम नदीम की दुकान की ओर बढ़ चले. दुकान से तो नदीम नदारत थे, नज़र घुमा कर देखा तो नदीम अपनी तहमत उठाये पार्क की दीवार से सट कर उकड़ू बुकड़ू बैठे दीवार की तराई करने में लगे हुये थे.
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लघु शंका समाप्त करके नदीम भाई उठे तो पाया कि हम चार लोग उनका इंतज़ार कर रहे हैं. नदीम भाई भागते हुये हामारे पास आये और रास्ते में अपने मुँह में भरी हुयी गुटखे की पीक को पार्क की दीवार पर थूका (इससे छीटें नहीं पड़ती हैं.) और लोहे की बाल्टी से एक चुल्लू पानी निकाल कर उसे दोनों हाथों में मलते हुये अपने हाथ भी साफ कर लिये. फिर तहमत में हाथ पोंछते हुये हमारे सामने खड़े होकर बत्तीसी निकालते हुये बोले,” अरे भैयाजी हमका बोलाए लिये होते, आप सब लोग काहे तकलीफ किये. का सेवा करेन आप लोगन की, चाय-वाय मंगवाई का?”
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राजेश बाबू बोले,” अरे यार इतनी बदबू में चाय कौन पियेगा? नदीम भाई तुम कैसे झेलते हो यह बदबू, वो भी दिन भर?”
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”हाँ भैया जी बहुतै लोग कहिन के हिंया बहुत बास आवै है, पन भैया जी हमका तो कौनो बास नाहीं लागै है. सायद आदत पड़ि गयी होइहै.”
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संजय ने कहा,” नदीम भाई, हम पार्क की सफाई करवाने की सोच रहे हैं. अगले हफ्ते यहीं पर पर्यावरण दिवस मनाने का विचार हैं. चक्कर यह है कि सफाई करवाने के अगले ही दिन पार्क फिर गंदा हो जायेगा, इसी सिलसिले में तुम्हारी मदद चाहिये.”
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नदीम भाई फूल गये, झट से बोले,” अरे भैया जी, हमरे लायक कौनो काम हो तो बतावें, हमहुं मदद करिबै.”
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मैं ने कहा,” नदीम भाई, हम लोग नगर निगम से कह कर यहाँ की सफाई करवा देंगे, आप ये देखो कि कल से कोई यहाँ टट्टी पेशाब करके फिर से गंदगी ना फैलाए.”
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नदीम भाई थोड़ी देर सोचने के बाद बोले,” भैयाजी, टट्टी पेशाब कौनो गंदगी थोड़ो ना होती है. अरे भैया जी गाँव में तो सबै खेतवन मा जावै हैं. इससे तो जमीन उपजाऊ होये है. हम तो कहे हैं कि यह गंदगी नाहीं है साहिब ये तो सोना है सोना, हाँ.”
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राजेश बाबू गरज पड़े,” अबे हमें यहाँ कोई खेती थोड़ी करनी है कि जमीन को उपजाऊ बनाना है! जितनी तो फसल ना उगेगी उससे ज़्यादा तो लोग खाद डाल जाते हैं, हाँ नहीं तो! और हाँ अगर सोना है तो सबसे कहो कि कल से सोनार की दुकान पर जाकर बैठा करें, हर दस ग्राम के 10,000 रुपये भी मिलेंगे, सबकी गरीबी दूर हो जायेगी. अगर पेट चल पड़े तो समझो एक ही दिन में बंदा करोड़पति बन जाये, के.बी.सी. में जाने की कोई जरूरत ना रहेगी. सोना है – हाँ नहीं तो!”
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नदीम भाई को अपनी गलती का अहसास हो गया. बोले,” आप लोग तनिकौ चिंता नाहीं करो, समझो कि कल से पार्क में लोटे वालों का प्रवेस बंद, हम परि छोड़ दो.”
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मनीष ने नगर निगम में पैसे खिला कर उसी दिन पार्क की सफाई करवा दी. नदीम भाई ने लोटे वालों को पार्क से बाहर रखने का एक नायाब तरीका निकाला. कहीं से एक मरे हुए कुत्ते का जुगाड़ किया और रात अंधेरे उसे पार्क में फेंक दिया. अगले दिन सुबह पार्क के पास मुँह में नीम का दातून दबा कर गेट के पास बैठ गये. जो भी लोटा लेकर पार्क की ओर अग्रसर होता नदीम भाई मुँह से दातून निकाल कर बोलते,” अमाँ भाई अंदर मत जाओ. कल रात बड़ा गजब होइ गवा.”
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उत्सुक आगंतुक अपने आप पूछ बैठता,” का होइ गवा नदीम भाई?”
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नदीम भाई बोलते,” अरे अब का बतावें, कल हम हिंया एक नाग देखै, ससुरा बहुतै लम्बा रहिस सम्झो कि हियाँ से हुंआ तक, करीब 8 फुट लंबा अउर इत्ता मोटा कि समझो कि जित्ता हीरो होंडा का टायर होवे है. कारिया नाग! फन उठाये सुसुरा पूरे पार्क में सर्र सर्र घूमत रहा. हमार तो करेजा दहिल गवा.” इतना कह कर नदीम मियाँ मुँह में दातून घुसेड़ कर दो बार चबाते और हाथ में लोटा थामे हुये आगंतुक को गौर से देखते हुये उसके अंदर जागे हुये डर की थाह लेते और फिर मुँह से दातून निकाल कर बोलते,” वही समय मति का मारा एक ठो कुकुरवा पार्कवा में घुसि गवा, करिया नाग उसे लपेट कर डस लिहिस. तरप तरप कर कुकुरवा उहीं ढ़ेर होई गवा. देखौ उसका लास पड़ा है हुंआ पे.” लोटा धारी पार्क के अंदर पड़ी लाश को देखता और फिर मन ही मन भगवान को और नदीम भाई को धन्यवाद देता कि आपकी वजह से हम बच गये वर्ना कुत्ते की जगह हम ही पड़े होते. नदीम भाए फिर से मुँह में दातून डालते हुये बोलते,” हमरी मानो तो अब हियाँ टट्टी करना बंद करि दो.”
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नदीम भाई का वृतांत सुन कर लोटा धारी आगंतुक पार्क की ओर ऐसी मायूसी से देखता कि मानो उसका बसा बसाया संसार किसी निर्मम ने वैसे छीन लिया हो जैसे भू-माफिया हमारी और आपकी जमीने हड़प लिया करते हैं. मारे घबराहट के बेचारे का प्रेशर और बढ जाता और वह दयनीय दशा में नदीम भाई से ही पूछ लेता,” तौ का करैं नदीम भाई, बहुतै जोर की आई है...”
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नदीम भाई उसे राय देते,” पार्क के अंदर दिखिस रहा सुसुरा, तुम ऐसा करो के पार्क के बाहरै बैठि जाओ. ध्यान से बैठिहो, कहीं ऐसा ना होवे कि तुम मगन रहौ और ऊ सुसुरा आय के तुमका डसि ले.” नदीम भाई हो हो करके हँसते हुये सलाह देते.
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बहुत से लोटा धारी “एनाकोण्डा” की यह पटकथा सुन कर नये पार्क की तलाश में भाग निकलते और जो कुछ सूरमा टाइप के थे या जिनको बहुत जोर से आयी होती थी वो दीवार के बाहर ही बैठ जाते। बेचारे मारे डर के बार बार ऐसे इधर उधर मुंडी घुमाते कि अगर चार दिन वहाँ बैठ जायें तो गर्दन की ऐसी कसरत हो कि ताउम्र स्पांडिलाइटिस की कोई शिकायत ना हो।
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(क्रमशः)
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
3:30 अपराह्न
10
टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
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रक्षा बंधन के अवसर पर, आइये आज सीखते हैं "बम्बइया राजमा" बनाना. वैसे तो रेसिपी चुराई हुयी है. इस पकाऊ पकवान के मूल खानसामे हैं साजिद खान, जिन्होंने ये रेसिपी रेडियो सिटी पर सुनाई थी.
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आवश्यक सामग्री:
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1. महारानी – 1
2. राजकुमार – 1
3. राजकुमार का गरीब लेकिन सच्चा मित्र – 1
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कहाँ से प्राप्त करें:
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वैसे तो साजिद खान ने यह नहीं बताया कि इन्हें कहाँ से प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन मेरे ख़्याल से मनमोहन देसाई की हिट फ़िलम “धरम-वीर” से ये सारे निकाले जा सकते हैं.
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बनाने की विधि:
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वीर एक बहुत बड़े साम्राज्य का राजकुमार है. वीर का एक सच्चा और अच्छा मित्र है - धरम. धरम एक निर्धन लोहार का पुत्र है. निर्धन होने के बावजूद, धरम बहुत ही ईमानदार, देशभक्त और खुद्दार व्यक्ति है. धरम और वीर एक दूसरे को बचपन से ही जानते हैं. वो एक साथ खेले और बड़े हुये हैं.
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दोनों मित्रों को अपनी सच्ची दोस्ती पर बहुत नाज़ है और वो अक्सर गाना गाते हैं - सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी, तोड़े से भी टूटे ना ये धरम-वीर की जोड़ी.
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एक दिन राजकुमार अपने गरीब (लेकिन सच्चे) मित्र को राजमाता से मिलवाने के लिये राजमहल लाता है. राजमहल में पहुँच कर, धरम राजमाता को भी अपनी दोस्ती के बारे में गा कर बताता है - दुख सुख के हम साथी हैं ये वादा है. इस पर वीर कहता है - अपना जो कुछ है सब आधा आधा है.
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इस पर धरम सेंटी हो कर गाता है - सब कुछ आधा आधा है तो, जब ये सच्चा वादा है तो, रानीमाँ मुझको भी ममता मिल जाये थोड़ी. यह सुन कर राजमाता के सीने में छिपा माँ का दिल ममता से भर उठता है. राजमाता को धरम में अपना खोया हुआ बेटा दिखने लगता है (इस खोये हुये बेटे के बारे में किसी को पता नहीं है, उसे फिल्म की पहली रील में ही जीवन, प्राण या के.एन.सिंह टाइप के बंदे ने गायब कर दिया था) . उनकी आँखें अश्रुपूरित हो उठती हैं और वह सिंहासन छोड़ कर धरम को गले से लगाती हुयी बोलती हैं - बेटा मैं तेरी माँ हूँ बेटा, तू मुझे राजमाता या रानीमाँ मत बोला कर, सिर्फ़ माँ बोला कर बेटा. बोलो बेटा - माँ.
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यह सुन कर धरम असमंजस में पड़ जाता है. उसके हृदय में द्वंद शुरू हो जाते हैं. एक जिम्मेदार नागरिक के होते महारानी को राजमाता बुलाना ही उचित है और यही तो राज्य का नियम भी है कि आम जनता महारानी को राजमाता कह कर संबोधित करे. लेकिन राजमाता हठ पकड़ लेती हैं कि नहीं तुम तो मुझे बस माँ कहो.
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राजहठ के आगे किसकी चली है? राजमाता धरम से कहती हैं कि वह उन्हें माँ कह ही संबोधित करे. ऐसे में बीरबल के समान चतुर वीर, समस्या का ऐसा हल बताते हैं कि राजमाता और मित्र दोनो की ही बात रख ली जाती है. वीर धरम से कहता है,” राज के नियमानुसार तुम ‘राज’ अवश्य लगाओ और माँ के आदेशानुसार तुम उन्हें सिर्फ़ माँ कहो – तो आज से तुम उनको राजमाँ कह कर बुलाया करो.
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तो लीजिये तैयार हो गया राजमा. शान से खाइये और मेहमानों को खिलाइये.
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बताइएगा अवश्य कि कैसा लगा.
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पूरब से सूर्य उगा, फैला उजियारा.
जागी हर दिशा दिशा, जागा जग सारा.
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राष्ट्रीय पकाऊ अभियान - चलो पकायें, कुछ कर दिखायें.
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
1:01 अपराह्न
6
टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
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पिछली बार हमने सीखा था हरी मटर बनाना. आइये आज सीखते हैं 'शुगर फ्री', 'फ़ैट फ्री' और कॉलेस्ट्राल फ्री' हलवा बनाना.
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आवश्यक सामग्री:
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1. अपहृत बच्चा – 1
2. अपहृत बच्चे की दुखियारी माँ – 1
3. काली पहाड़ी के पीछे वाला जंगल – 1
4. कुछ चट्टानें, काँच के टुकड़े – स्वादानुसार
5. खिलौने वाली पिस्तौल – 1
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कहाँ से प्राप्त करें:
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अपहृत बच्चा और उसकी दुखियारी माँ प्राप्त करने के लिये आप उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आ जाइये. लखनऊ नगर के विधान सभा मार्ग पर स्थित विधान सभा भवन पहुंच जाइये. विधान सभा भवन में बेरोक-टोक आने जाने वाली सफ़ेद अम्बेसडर कार (जिसमें कि नम्बर प्लेट के स्थान पर “विधायक” की तख़्ती झूलती है और सामने बड़े बड़े प्रेशर हार्न और ऊपर लाल बत्ती लगी रहती है) के अंदर बैठे खादी धारी महोदय से संपर्क करिये, वो आपको तुरंत ही एक अपहृत बच्चा दिलवा देंगे. आम तौर पर अपहृत बच्चे गोदाम में उपलब्ध रहते हैं (ऑफ़ द शेल्फ़) लेकिन किन्हीं कारणवश यदि बच्चा गोदाम में उपलब्ध नहीं है तो खादी धारी जी दो – एक घंटे में यह काम करवा देंगे.
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शहर के किसी भी टीले या पहाड़ या किसी भी पर्वाताकार कूड़े के ढ़ेर को काली पहाड़ी का नाम और उसके पीछे के इलाके को जंगल का नाम दे कर आप काली पहाड़ी के पीछे वाला जंगल प्राप्त कर सकते हैं.
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चट्टानों के टुकड़े तथा काँच के टुकड़े प्राप्त करने के लिये उन स्थानों पर जाइये जहाँ विपक्षी दलों आयोजित ‘शांति पूर्ण’ मोर्चा या जुलूस अभी अभी समाप्त हुआ है. वहाँ आपको ख़ास क़िस्म के नुकीले पत्थर और सरकारी इमारतों व बसों की खिड़कियों के टूटे शीशे बहुतायत में प्राप्त होंगे.
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पटाखे की दुकान से खिलौने वाली पिस्तौल खरीदिये. साथ में चुटपुटिया की लड़ी भी ले लीजिये. इससे पिस्तौल चलाते समय ध्वनि प्रभाव बहुत अच्छा आयेगा, अन्यथा पिस्तौल चलाते समय आपको मुँह से ही ‘धाँय – धाँय’ की आवाज़ निकालनी पड़ेगी.
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बनाने की विधि:
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पहले अपहृत बच्चे को अपने कब्जे में ले लीजिये. एक दिन तक उसे मैरिनेट करिये, मतलब उसे हिमेश रेशमिया के गाने सुनाइये, करण कपूर की फ़िल्में दिखाइये इसका असर यह होगा कि बच्चा आपसे बहुत आतंकित हो उठेगा और मौका मिलते ही आपको देख कर ही भाग खड़ा होगा.
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अब बच्चे की दुखियारी माँ को फोन करिये. दुखियारी अबला नारी को बताइये कि उसका शहज़ादा आपके कब्ज़े में है जिसे वो रात के ठीक ग्यारह बजे काली पहाड़ी के पीछे वाले जंगल से ले जा सकती है.
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बच्चे की दुखियारी माँ को यह भी बता दीजिये कि वह अमुख अमुख स्थान पर ही खड़ी रहे और यदि वह बताये हुये स्थान से जरा सा भी हिलेगी तो उसके राज दुलारे को खिलौने वाली पिस्तौल से गोली मार कर ढ़ेर कर दिया जायेगा.
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निश्चित समय से कुछ पहले आप काली पहाड़ी के पीछे वाले जंगल में पहुंच जाइए और दुखियारी माँ के खड़े होने के निर्धारित स्थान तथा बच्चे के बीच में पत्थर और काँच के टुकड़े बिछा दीजिये.
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दुखियारी माँ के आते ही बच्चे को छोड़ दीजिये और चट्ट चट्ट दो बार पिस्तौल दाग कर चिल्लाइये “भाग”. बच्चा ऐसे ही हिमेश और करण से बाकायदा मैरिनेट हो चुका था आपकी चट्ट चट्ट और भाग सुनते ही अपनी माँ की तरफ़ बेतहाशा भागेगा.
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और उधर दुखियारी माँ अपनी बाहें फैलाए अपने राज दुलारे को गले से लगाने के लिये तड़पती हुयी चीखेगी,” भाग बचवा भाग ! कसि कै भाग !! आवा, आयके अपनी महितारी के करेजे से लगि जावा मोरे लाल !! भागि बचवा भागि...”
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अब आपको हलुवे के भुनने की सोंधी सोंधी खुश्बू आने लगेगी, लेकिन हलुवा अभी पूरी तरह भुना नहीं है.
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अचानक दुखियारी माँ को दिखेगा कि बच्चा भागते हुये काँच और नुकीले पत्थरों के पास पहुँच गया है. वो सोचती है ‘हे ईस्वर हमरे लाल के पैरन मा काँच चुभि जैहै.’ लेकिन वो हिम्मत नहीं हारती है. भारतीय माँ है, मदर इंडिया है, बच्चे से कहती है,” ऐ बचवा भागि मत. रुक! देख काँच है हुंआ. रुक, भागो नाहीं. सम्भाल के आवा. धीरे धीरे आवा, हाँ धीरे धीरे, हलू – हलू, धीरे आ, हलू आ, हलु आ, हलुवा..हलुवा...हलवा”
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तो लीजिये तैयार हो गया हलवा. शान से खाइये और मेहमानों को खिलाइये.
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बताइएगा अवश्य कि कैसा लगा.
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यह लेख आप तक पहुँचा "राष्ट्रीय पकाऊ अभियान" के सौजन्य से - चलो पकाएँ, कुछ कर दिखाएँ!
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अगली कड़ी में सीखेंगे राजमा बनाना.
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
1:05 अपराह्न
4
टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
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आइये आज सीखते हैं हरी मटर बनाना.
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आवश्यक सामग्री:
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1. मोटर कार – 1 (ध्यान रहे कि यह मोटर कार हरे रंग की ना हो)
2. हरा पेंट – 4 लीटर
3. कूची (ब्रश) – 1
4. बप्पी लाहिड़ी – 1
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कहाँ से प्राप्त करें:
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अपनी मोटर कार का प्रयोग कतई मत करिये. अपने पड़ोसी पर कुछ दिन आँख रखिये, यदि वो उनमें से हैं जिन्होंने मोटर कार सिर्फ़ इसलिये खरीदी है ताकि आपको जला सकें ना कि इसलिये कि उसे चला कर ऑफिस जाया जाये और यदि वो स्कूटर से ऑफिस जाते हुये अपनी मोटर कार को आपके घर के गेट से सटा कर महज़ इसलिये छोड़ जाते हैं कि दिन भर आपके कलेजे पर साँप लोटे, तो समझ लीजिये कि आपको मोटर कार मिल गयी है.
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कुछ दिनों तक पड़ोसी के घर से निकलने और वापस आने का समय देख कर हरी मटर बनाने का ऐसा समय चुनिये कि पड़ोसी पकाने के समय किसी भी प्रकार का विध्न डालने ना आ टपकें.
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हरा रंग और कूची निकट की रंग वाली दुकान से लीजिये. ध्यान रहे कि रंग सबसे सस्ता वाला होना चाहिये.
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बप्पी लाहिड़ी को आप ‘सारेगामा’ से पकड़ कर उठा लाइये (उठाते समय यह ध्यान रखियेगा कि इस काम के लिये आपको एक क्रेन की आवश्यकता पड़ सकती है). यदि किन्हीं कारणों के चलते (जैसे चौकीदार का आपको स्टूडियो में अंदर ना घुसने देना) यदि आप बप्पी दा को वहाँ से ना उठा पायें तो फिल्म निर्माताओं के ऑफिस के बाहर काम मांगने वालों की लम्बी कतार में बप्पी दा खड़े मिल जायेंगे, उन्हें वहीं से उठा लाइये या यह प्रलोभन दीजिये कि आप उनको किसी संगीत मुकाबले में निर्णायक का पद देंगे, वह स्वयं ही आपके पीछे चल पड़ेंगे.
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बनाने की विधि:
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पहले बप्पी दा को अपने पड़ोसी की मोटर दिखा दीजिये और फिर उनको वहाँ से हटा कर बिना खिड़की वाली कोठरी में बंद कर दीजिये.
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अब पेंट का डिब्बा खोलिये और कूची डुबो डुबो कर पड़ेसी की पूरी कार हरे रंग से रंग दीजिये. इस काम को आराम से धीरे धीरे एक ही हाथ से करिये, साथ में ध्यान रखिये कि कार का कोई भी हिस्सा बचा ना रहे – पूरी तरह हरा हो जाये.
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जरूरत होने पर एक कोट और दीजिये. ख़ास कर कि मोटर के शीशों, सीट, अंदर बिछी कालीन, बम्पर, टायर इत्यादि को दो कोट अवश्य दीजिये.
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अब पाँच मिनट तक मोटर को धूप में धीरे धीरे सूखने दीजिये. ज़रूरत होने पर शीशों पर एक कोट और लगाइये और फिर दस मिनट तक सूखने दीजिये.
.ss
10 मिनट के बाद बप्पी दा को बाहर निकालिये और पड़ोसी की कार फिर से दिखाइये. बप्पी दा बोलेंगे,” उड़ी बाबा, खूब भालो. तूम तो घोर में ही होरी मोटर बोना लीया.” उनका यह संवाद मेहमान हिंदी ऐसे अनुवादित करेंगे,” अरे वाह, बहुत बढ़िया, तुमने तो घर में ही हरी मटर बना ली.”
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तो लीजिये तैयार हो गयी हरी मटर. शान से खाइये और मेहमानों को खिलाइये.
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बताइएगा अवश्य कि कैसा लगी.
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यह लेख आप तक पहुँचा "राष्ट्रीय पकाऊ अभियान" के सौजन्य से.
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
11:53 पूर्वाह्न
5
टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
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ये अनुगूँज में भी कहाँ - कहाँ से टॉपिक उठा लाते हैं, हाँ नहीं तो. बोले कि सोचो क्या होगा गर हिन्दुस्तान बन जाये अमरीका. हमने भी सोचा कि भैया कोई दिक्कत नहीं, केवल सोचने को ही तो कह रहे हैं, सही में थोड़े ही ना बना जा रहा है. लेकिन जब सोचा तो भइया सोच कर ही रूह भीतर तक काँप गयी. ऐसा झटका लगा कि मानो फ़िल्मों की सारी हिरोइनें अपना मेक-अप धो-धा कर सामने आ कर खड़ी हो गयी हों. दिल घबरा गया, धड़कन तेज़ हो गयी और मारे घबराहट के सू-सू आ गयी.
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सू-सू एक ऐसा ब्रह्मास्त्र है जो कि आपको विकट से विकट संकट से भी मुक्ति दिला सकता है. क्लास में मन नहीं लग रहा है – हाथ उठाइये और बोलिये टीचरजी सू-सू आई – और ये ल्यो भइया मिल गयी बाहर जाने की इजाज़त. ऑफिस में डेस्क पर बैठ कर ब्लॉग पढ़ते और लिखते बोर हो रहे हैं तो जाइये, सू-सू के बहाने घूम आइए.
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अब ये सब बातें पढ़ कर आप ये ना समझने लगिये कि मैं सैर करने बाहर जा रहा था. भई हमको तो डर के मारे सच्ची की सू-सू आ गयी. तो हम उठे और चल दिये ऑफिस के बाहर. अब आप सोच रहे होंगे कि ऑफिस के बाहर क्यों? तो भई, ऐसा नहीं है कि हम पहले से ही ऑफिस के बाहर सू-सू करने जाते थे. दो साल पहले तक तो हम ऑफिस के अंदर ही बना हुआ शौचालय इस्तेमाल करते थे. दो अलग अलग शौचालय थे हमारे ऑफिस में हुम्म! एक के दरवाज़े पर लिखा था “शौचालय पुरुष” और दूसरे के दरवाज़े पर लिखा था “शौचालय महिलाएँ”.
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अब क्या हुआ कि दो साल पहले किसी मनचले ने ‘महिलाएँ’ से ‘म’ मिटा दिया, तो भई दरवाज़े पर सिर्फ़ ये लिखा रह गया “शौचालय हिलाएँ”. उन्हीं दिनों एक नए रिक्रूट आये ऑफिस में, अब उनको पता नहीं था कि “शौचालय पुरुष” और “शौचालय हिलाएँ” में किधर जाना है. पता नहीं कि मनचले टाइप के थे या गलती से मिस्टेक हो गयी बेचारे “हिलाएँ” में चले गये. अब पूछिये मत, अंदर से जब साहब बाहर निकले, तो गाल पर सैंडिलों के निशान, मथ्थे पर गूमड़ और आँख ले नीचे काला. बात बड़े साहब तक पहुंची, और उन्होंने फैसला सुनाया कि आज से पुरुषों का शौचालय इस्तेमाल करना बंद. उस दिन के बाद से दोनो ही शौचालय “शौचालय हिलाएँ” बन गये हैं और हमें जाना पड़ता है ऑफिस के बाहर.
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तो ख़ैर साहब हम चले ऑफिस के बाहर ये सोचते हुये कि भारत यदि अमरीका बन गया तो क्या होगा? सबसे पहली बात जो हमारे मन में आई वो थी;
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1. भारत की सारी नई इमारतें कमज़ोर ही बनेंगी:
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आप पूछेंगे कि भइया वो कैसे? तो वो ऐसे कि ऊपर बताये प्रंसंग के बाद हम पुरुषों ने बाहर जुगाड़ ढ़ूँढ़ने शुरू किये. वो तो भला हो कि ऑफिस से लगे हुये खाली मैदान के चारों ओर पी.डब्लू.डी. ने दीवार बनानी शुरू कर दी और हमारी खोज वहीं समाप्त हो गयी. ऑफिस की तमाम पुरुष जाति ने एकमत होकर यह सोचा कि राष्ट्र के मज़बूत भविष्य के लिये हम भी योगदान देंगे. हमने ये फैसला किया कि मैदान के चारों ओर बनाई जा रही सरकारी दीवार की हम नियमित रूप से तराई किया करेंगे. बस, वो दिन था और आज का दिन है, हम सरकारी दीवार की तराई में अविरत लगे हुये हैं.
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भाई साहब, आप मानियेगा नहीं, आज दो साल हो गये हैं उस दीवार को बने हुये और ये हमारी तराई का ही नतीजा है कि उस दीवार पर लगाया गया पी.डब्लू.डी. का बालू ज़्यादा और सीमेंट कम वाला प्लास्टर भले ही धुल कर बह गया हो, भले ही उस दीवार की एक एक ईंट दिखती हो, लेकिन वह आज भी वैसे ही मजबूती से खड़ी हमारी अविरत तराई की दाद देती है.
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अगर भारत, अमरीका बन गया तो हमसे दीवारों पर सू-सू (तराई) करने का अधिकर छिन जायेगा. राष्ट्र निर्माण में सदुपयोगी सिद्ध होती सू-सू ना ही केवल सीवर लाइन के जरिये नदियों में मिल कर उनको प्रदूषित करेगी, बल्कि नये राष्ट्र की नई इमारतों को कच्चा करेगी.
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2. ज़मीन बंजर हो जायेगी:
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रेल गाड़ी में तो आपने अवश्य ही यात्रा करी होगी. रेल की पटरी के दोनों ओर हरे-भरे लहलहाते हुये खेत कितने मनभावन लगते हैं. क्या कभी आपने ये सोचा है कि वो कौन सी ताकत है जो रेलवे लाइन के किनारे के खेतों को हरा भरा रखती है? क्या आप हरियाले के उन अनजान सिपाहियों को जानते हैं जिनका नाम इतिहास के पन्नों में नहीं मिलता? अगली बार ट्रेन से यात्रा करते हुये ज़रा ग़ौर से देखियेगा (मुंबई की लोकल ट्रेनों के यात्रियों को बिना गौर किये ही दिख जायेगा), उन झाड़ियों के पीछे हमारे गाँव के जागरूक नागरिक, स्वेच्छा से और निःस्वार्थ भावना से ट्रेन की पटरी के किनारे अपना मल-दान करते हुये दिख जायेंगे.
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आगे बढ़ने से पहले आइये, हम इनके योगदान की सराहना करते हुये, इनके प्रति नतमस्तक होकर दो मिनट का मौन धारण करें.
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सोचिये, अगर भारत अमरीका बन गया तो मल-दान करते हुये, हरियाली के इन सिपाहियों को “अभद्र प्रदर्शन” के इल्ज़ाम लगा कर कारागार में डाल दिया जायेगा. बिना इनके आये, धरती प्राकृतिक उर्वरक के लिये तरसेगी. भूखी रह जायेगी हमारी हिरण्यगर्भा. सूख जायेंगे हरे भरे खेत. सोचिये क्या आप चेहरे हो अपने पंजे से ढ़ाँक कर (मनोज कुमार उर्फ़ भारत इश्टाइल में) ये गाना गा पायेंगे “मेरे देश की धरती सोना उगले..” नहीं ना!!
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ज़मीन को बंजर होने से बचाइये, हिन्द को हिन्द ही रहने दो कोई नाम ना दो.
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3. सारे पेड़ कट जायेंगे:
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एक मुश्किल ये भी कि भइ पेड़ धड़ाधड़ कट जायेंगे. पूछिये कि भाई वो कैसे? हाँ, तो वो ऐसे कि हम हिन्दुस्तानी अपनी नित्य क्रिया करने के पश्चात पानी के स्वयं को साफ़ कर लेते हैं. लेकिन अमरीका बनने के पश्चात हमें कागज़ या टायलेट पेपर इस्तेमाल करना पड़ेगा. (टायलेट पेपर के विकल्प के रूप में हम ‘द टाइम्स ऑफ़ इंडिया’ इस्तेमाल नहीं कर पायेंगे क्योंकि अमरीका बनते ही वह भी बंद हो जायेगा).
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अब उस भयानक समय की कल्पना करिये जब कि तकरीबन 1,20,00,00,000 भारतीय (या अमरीकी) सुबह सुबह कागज़ का प्रयोग करेंगे. आपको तो महसूस भी ना होगा और आपके बैठे बैठे कितने ही पेड़ शहीद हो जायेंगे.
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1,20,00,00,000 लोगों की इस तुच्छ सी दैनिक माँग को पूरा करने के चक्कर में इतने पेड़ कटेंगे कि धरती सूनी हो जायेगी.
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4. शादी की बर्बादी हो जायेगी:
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हिन्दुस्तानी शादियों की चमक दमक के बारे में क्या बतायें. समझिये कि मेला ही लगता है. लोग कितने दिनों से तैयारियाँ करते हैं कि फलाने की शादी में जायेंगे. बीबी जी साड़ी और गहने खरीदती हैं और इसी बहाने मियाँ जी को भी एक ठो पैंट और कमीज मिल जाती है. बन्ना-बन्नी गाने का रियाज़ किया जाता है – बन्ने काला कोट सिलवाना, उसमें सोने के बटन लगाना. कुछ एक बन्नों को देख कर सोचता हूँ कि यदि इसने काला कोट सिलवा कर पहन लिया तो ये तो पता ही नहीं चलेगा कि बन्ना कहाँ खतम हुआ है और कोट कहाँ से शुरू हुआ है.
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लपक धपक सब शादी में पहुँचते हैं. महिला संगीत के बहाने महिलायें ढोलक पीट पीट कर ऊँचे सुरों में बन्ना-बन्नी गाती हैं. अरे इससे हमें क्या कि पड़ोसी के बच्चे का हाई-स्कूल का इंतहान है. पड़ोसी भी मन मसोस कर सिर्फ़ इसलिये चुप रह जाता है कि ‘गाओ, बेटा गाओ, पिंटू की शादी में लाउड स्पीकर लगवा कर महिला संगीत करवाऊँगा तब झेलना.’
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बीबी जी को मस्ती मारते देख कर मियाँ जी भी जोश में !! इधर बारात निकली और उधर मियाँ जी ने सोनी ब्रास बैण्ड वाले को बीस रुपये का पत्ता थमा कर फ़रमाइश करी – ‘नागिन वाना मन डोले मेरा तन डोले’ और ‘नया दौर वाला ये देश है वीर जवानों का’ वाला गाना बजाओ.
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बैण्ड वाला शुरू – और मियाँ जी ने जेब से रुमाल निकाल कर झाड़ा, एक कोना मुँह दाँतों के बीच में दाबा, दूसरा कोना हाथों में थामा और सपेरा बन कर शुरू, बन्ने के ताऊ जी भी जोशिया गये, सिर के ऊपर दोनों हथेलियाँ टांगी और अपनी थुलथुल तोंद और कमर हिलाते हुये नागिन बन कर नाचना शुरू. पूरा पिरोगिराम सड़क के बीचों-बीच. क्या मज़ा आता है.
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धीरे धीरे सारे बराती, बन्ने के दोस्त, ताऊ, चाचा, बाऊ जी, बाऊ जी के दोस्त सब के सब अपनी थुलथुली तोंद और कूल्हे हिलाते हुये सड़क पर चक्का जाम करते हुये नाचना शुरू. अब ट्रैफिक जाम, एम्बुलेंस या फायर ब्रिगेड के रुकने जैसी छोटी छोटी बातों से काहे अपना मूड खराब करें भाई. शादी कोई रोज़-रोज थोड़े ही ना होती है.
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शादी के दूसरे दिन होती है भात की रस्म. भात के समय नाते-रिश्ते, गली-मोहल्ले की औरतें मिल कर बरातियों को गालियाँ गाती हैं. गालियाँ सुन कर बराती इन महिलाओं को शगुन भी देते हैं.
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अब अगर भारत बन गया अमरीका तो जैसे ही औरतों ने ढ़ोल पीट कर गाना शुरू किया वैसे ही पड़ोसी ने मिलाया 911. इधर आप सड़क पर ट्रैफिक जाम करके नाचे उधर सारे के सारी बराती गये ‘ससुराल’. भात के समय महिलाओं ने गालियाँ गायीं तो समझो कि बरातियों ने उनको भी अभद्र भाषा के प्रयोग करने का लगाया इल्ज़ाम और जेल में किया उनका इंतजाम.
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शार्ट में ये समझिये कि शादियों से रस ही खतम हो जायेगा. वो बड़े बुज़ुर्ग जो आज युवाओं पर जोर डाल कर हकते हैं कि बेटा जल्दी से मेरे लिये एक बहू ला दे, वही कहेंगे कि मत कर शादी, ये भी कोई शादी है – ये तो शादी की बर्बादी है.
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अब जवानी कोई फिक्सड डिपासिट में रखने की चीज़ तो है नहीं, जवान लड़के-लड़कियाँ इसे बिना शादी के ही खर्च करने लगेंगे, इससे समाज का नैतिक पतन होगा. मान्यताओं को ठेस लगेगी. और सबसे बड़ी बात ये कि हम सड़क पर नाच नहीं पायेंगे!!
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ये तो हुयीं चार बातें.
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5. और भी ग़म हैं:
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- हम हाई वे पर उल्टी दिशा में गाड़ी नहीं चला पायेंगे.
- सड़क के किनारे लगे पान-सिगरेट के खोमचे उठ जायेंगे, असुविधा होगी.
- नेता जी अपनी प्रेयसी को गर्भवती करके, बदनामी से बचने के लिये उसकी हत्या नहीं करवा पायेंगे – ग्रॉड ज्यूरी को झेलना पड़ेगा
- सबके पास कार हो जायेगी जिसके चलते ट्रेनों में भीड़ कम हो जायेगी. इसका दुष्परिणाम यह होगा कि मुंबई की लोकल ट्रेनों में जो मुफ़्त की मालिश मिलती है वो बंद हो जायेगी.
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वैसे तो बहुत सी बातें हैं, लेकिन फ़िलहाल इतना काफ़ी!!
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
2:49 अपराह्न
7
टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
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पुराणिक जी ने कुछ दिन पहले गोरा बनाने वाले जादूई लेप पर यह लेख लिखा था और साथ में बड़ी सी चिप्पी भी चिपका दी कि इस लेख को महिलायें कतई भी ना पढ़ें. मतलब साफ़ – पुरुष और पशु चाहें तो पढ़ लें महिलायें नहीं पढ़ सकतीं.
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अब साहब आप ही बताइये, ऐसी शर्त से भला कौन खुश हो सकता है. महिलाओं ने नथुने फड़काते हुये कहा,” पशुओं की बात तो समझ में आती है, लेकिन ऐसी क्या बात है कि मुए मरद पढ़ सकते हैं लेकिन हम नहीं.”. कुछ बोलीं,” अरे ठीक ही तो किया पशुओं और पुरुषों की श्रेणी से बाहर रख कर हमें सम्मान ही दिया है.”
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उधर पुरुष भी घुन्ने में आ गये,” बताइये साहब, ये पुराणिक साहब ने हमें पशुओं की श्रेणी में ला खड़ा किया है. ये तो हद ही हो गयी भाई!”
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कुछ पुरुष जिनको अपने आत्मसम्मान की तनिक भी चिंता नहीं है, दबी आवाज़ में बोले,” ठीक ही तो कह रहे हैं, गौर से देखो तो उन्होंने हमें पशुओं की श्रेणी में खड़ा करके, हमारा समाजिक स्तर ऊँचा ही किया है. पशु तो यदा-कदा ही पिटते हैं और हम, बीबी से, सास से, बॉस से, घर में, ऑफिस में जहाँ भी देखो, पिटते ही रहते हैं.
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अब हुआ ये कि ये छोटी छॉटी नोंक झोंक विवाद बन गयी और महिलाओं और पुरुषों के गुट इस विषय को ले कर जूतम लात पर उतारू हो गये.
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लेकिन, इस सब बातों से दूर, राजेश बाबू की प्यारी, सांवली सलोनी भैंस – श्यामा, इस लेख से बड़ी खुश. मुस्कुराते हुये रंभाई,” कोई तो है जिसने हमारे बारे में भी सोचा. आज ब्लॉग पढ़ने का निमंत्रण मिला है, कल किसी पार्टी का टिकट मिलेगा, फ़िर क्या मालुम किसी फ़िल्म में बिपाशा की जुड़वा बहन का रोल भी मिल जाये.” थोड़ी देर तक आंखें मूंद कर श्यामा ने कुछ सोचा और फिर रंभाई,” बेचारी बिपाशा! मेरे फ़िल्मों में आ जाने से तो वो बुरी तरह पिट जायेगी. भला मेरा और उसका क्या मुकाबला? वो तो फिर भी रुमाल के साइज़ के कपड़े पहन लेती है हम तो बिना कुछ पहने ही स्क्रीन पर आ जायेंगे, कौन देखेगा बेचारी को ? कितना छटपटाएगी. कैसे चीख चीख कर कहेगी ‘अब-रहम, अब-रहम’ (एब्राहम).”
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बड़ी खुश. मुस्कुराये जाये. गुनगुनाये जाये. मटक कर गोमती नदी की ओर चल पड़ी. गोमती वही नदी है जो किसी समय लखनऊ की मशहूर “शाम-ए-अवध” से जुड़ी हुयी थी और आज शहर के तमाम नालों और सीवर लाइनों से जुड़ी पाई जाती है. सुबह होते ही तमाम ग्वाले अपनी भैंसों को नहलाने – धुलाने और गर्मी से बचाने के लिये गोमती में ठेल देते हैं. दिन भर भैंसों की मीटिंग वहीं होती है.
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गोमती में घुसते ही श्यामा ज़ोर से रंभाई,” बॉ S S S S S ...”
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सब भैंसन ने घेर लिया,” क्या बात है श्यामा बहिन बहुत खुश दिखाई दे रही हो, कोई ‘गुड न्यूज़’ है क्या?”
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”अरे धत्त, तुम लोग तो बस एक ही बात सोचती हो.” श्यामा कुछ लजा सी गयी,” खबर तो अच्छी है लेकिन वो नहीं जो तुम सब सोच रही हो.”
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”ऐसा क्या? कमर सिंह जी का दिल आ गया है क्या तुम पर?”
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श्यामा हताश होते हुये बोली,” नहीं री, वो तो उस मुई बिप्स पर ना जाने क्यों फ़िदा हैं. खैर, मैं तो ऐसी खबर लाई हूँ जिससे हमारे सारे कष्टों का निवारण हो जायेगा.”
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इतना सुनना था कि सारी भैंसों ने श्यामा को धर घेरा, जो भैंसें गोमती के तट पर घास चर रही थीं, या पेड़ के नीचे बैठ कर जुगाली कर रही थीं, वो भी छपाक छपाक गोमती में कूद कर श्यामा के पास आ गयीं.
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श्यामा ने अपनी पूंछ से नथुने और मुँह पर मंडराती हुयी मक्खियों को उड़ाते हुये कहा,
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” बहिनों, सदियों से हम पर होते आ रहे अविरत अत्याचारों का मूल कारण आज मुझे पता चल गया है. हमारे साथ मानव जाति ने जो सौतेला व्यव्हार किया है उसका कारण भी पता चल गया है.
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ऐसा क्यों होता आ रहा है हमारे साथ, कि मानव जाति दूध तो हमारा पीती है और पूजा करती है गाय की. दूध पिया हमारा और मइया बनी गइया. गाय को मंदिरों में स्थान दिया और हमें इस प्रदूषित गोमती में.
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गाय का मांस खाने से पाप लगता है! लेकिन जब ‘बीफ़’ खाने का मन किया तो हम भैंसों को हलाल कर दिया! ये क्या बात हुयी?
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केवल इतना ही नहीं बहिनों, उनका साहित्य पढ़ो, जब किसी सीधी सादी सर्वगुण सम्पन्न नारी की बात होती है तो उसे गाय कह कर पुकारते हैं. जब किसी मोटी, काली कलूटी, बदसूरत सी औरत का विवरण देना होता है तो कहते हैं कि ‘वो तो भैंस है भैंस’. सभी इच्छा पूरी करने वाली को “कामधेनु” कहते हैं, मैं पूछती हूँ कि “काम-भैंस” क्यों नहीं कहते. गाय को शशी कपूर जैसे ‘हैण्डसम’ दिखने वाले कृष्ण के साथ जोड़ा और हमें जोड़ा अजय देवगन के हमशक्ल यमराज से. कोई अच्छा लड़का मिलता है तो उसे कहते हैं कूल ‘गाय’, कूल ‘भैंस’ क्यों नहीं कहते भाई? क्या ये न्याय है?”
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”श्यामा बहिन, बात तो ठीक कहती हो, लेकिन क्या करें हम हैं ही काले-कलूटे.”
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”हाँ श्यामा बहिन, काला होना बहुत बड़ा अभिशाप है.”
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”गुस्सा शांत करो श्यामा बहिन, मानव श्याम सुंदर की पूजा भले ही करते हों, लेकिन कालों को पसंद नहीं करते. अब देखो ना सांवली कन्या के दहेज कें अधिक पैसा लगता है. सांवली कन्या एयर होस्टेस नहीं बन सकती, टीवी पर क्रिकेट की कमेंट्री नहीं बोल सकती और तो और पाप की कमाई को भी काली कमाई बोलते हैं. कुछ उल्टा पुल्टा हो जाये तो कहते हैं कि मुँह काला हो गया.”
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सबकी बातें सुन कर श्यामा रंभाई,” सही कहा ! तो तुम ये सब समझ चुकी हो कि यह काला रंग ही हमारे कष्टों और त्रासदियों का मूल कारण है. मैं भी यही कहना चाहती थी ! चलो हम अपने कष्टों से मुक्त होते हैं इस काले रंग से मुक्त होते हैं.”
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ये सुन कर कुछ भैंसे तो फुसफुसाते हुयी रंभाईं,” बेचारी श्यामा बहिन, इंसानी ब्लॉग पढ़ पढ़ कर और इंसानी टीवी धारावाहिक देख देख कर, कैसी अजीब बातें करने लगी है.”
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श्यामा ने फुसफुसाहट सुन ली और रंभाई,” मैं अजीब बातें नहीं कर रही हूं. सच कहती हूँ. अब हमारे पास साधन हैं कि हम अपने काले रंग से छुटकारा पा कर खुद को गाय की पूज्य श्रेणी में ला खड़ा करेंगे.”
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”वो कैसे श्यामा बहिन?”
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श्यामा ने पूंछ से अपना मुंह साफ़ करते हुये कहा,” हम सब कल से ‘फ़ेयर एण्ड लवली’ लगायेंगे.”
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
9:15 पूर्वाह्न
3
टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
विकट रूप धरि
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फाइनल इक्ज़ाम में लच्छू भाई अपने सूक्ष्म रूप पुर्चियाँ ले कर पहुँच गये. हमारा सेंटर जिस कॉलेज में पड़ा था, वह कॉलेज अपनी सख़्ती के लिये बहुत मशहूर था. खास कर श्री गजेन्द्र सिंह जी के लिये. श्री गजेन्द्र सिंह जी उसी कॉलेज में अध्यापक थे और अपनी सख़्ती के लिये पूरे शहर में जाने जाते थे और इसी सख़्ती के चलते लोग उन्हें चट्टान सिंह कहते थे. अगर गजेन्द्र जी ने किसी को नकल करते धर लिया, तो भैया समझो कि वो तो गया काम से. पहले तो गजेन्द्र सिंह कॉपी में पुर्ची नत्थी करके बालक को रेस्टीकेट करते और फिर मार मार कर बालक का मलीदा बना देते. बहुत बेरहमी से मारते थे भाई!
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ख़ैर, लच्छू इतना पारंगत और आत्मविश्वासी टाइप का बालक था कि उसे पूरा भरोसा था कि चट्टान सिंह जी भी उसे धर ना पायेंगे. विधि को कदाचित कुछ और ही मंज़ूर था. एक दिन पेपर मिलने के बाद जब लच्छू ने अपनी कॉलर के नीचे उंगली घुसेड़ कर विषय सूची निकालनी चाहिये तो पाया कि विषय सूची तो नदारत थी. बेचारा घबरा गया और इधर उधर ताक तूक कर अपनी सूक्ष्म रूप विषय सूची ढ़ूंढ़ने लगा. मारे घबराहट के कभी कुर्सी के नीचे देखे तो कभी डेस्क के नीचे. उसका यह हिलना डुलना चट्टान सिंह जी को रास नहीं आया और वो पास आकर लच्छू से बोले,” क्या नाम है तुम्हारा?”
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चट्टान सिंह जी को देखते ही लच्छू की तो बोलती बंद हो गयी. जस तस बोला,” जी.. लच्छू...जी..लछमी परसाद...”
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चट्टान सिंह गब्बर के अंदाज़ में पूछे,” क्या ढ़ूंढ़ रहे हो?”
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अब लच्छू क्या बोलते. हकला कर रह गये,” जी कुच्छौ नहीं...कुच्छौ तो नहीं...”
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चट्टान सिंह जी दहाड़े,” खड़े हो जाओ !”
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लच्छू खड़े!
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चट्टान सिंह जी ने लच्छू को एक ऐसा झन्नाटेदार कंटाप रसीदा कि थप्पड़ की गूंज पूरे शहर में सुनाई पड़ी होगी. लच्छू घबराये,” हमसे का गलती हो गयी गुरू जी?”
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चट्टान सिंह जी ने कथा वाचन शुरू किया,” निकालो, कमीज की तुरपाई के अंदर से ‘गति के समीकरण’, कमीज की दाहिनी आस्तीन के पहले फोलड से ‘आपेक्षित घनत्व’, दूसरे फोल्ड से ‘परावर्तन के नियम’....”
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विकट रूप धर गुरू जी बोलते रहे और सूक्ष्म रूप धारे लच्छू का, पुर्ची निकालते निकालते, चीर हरण होता रहा और हम सब बेबस पाण्डवों की तरह यह विचलित करने वाला दृश्य, सीने पर पत्थर रख कर देखते रहे. जब विषय सूची यह बखान करने लगी कि अमुख अमुख पुर्चियों के अज्ञातवास का स्थान लच्छू की चढ़्ढ़ी के अंदर है तो हमने भी मार्मिक दृश्य देखना बंद किया और कॉपी में सिर घुसेड़ कर अपने जवाब लिखने लगे.
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बेचारा लच्छू.
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ये तो कहिये कि लच्छू के बाऊ जी ने एक बार चट्टान सिंह जी का कोई काम बिना सुविधा शुल्क लिये ही करवा दिया था, जिसके चलते लच्छू रस्टीकेट होने से तो बच गये लेकिन चट्टान सिंह जी के कोप से ना बच पाये. बेचारा लच्छू इतनी बुरी तरह पिटा कि शाम को साइकिल चलाने लायक भी ना रहा. ये तो भला हो राजेश बाबू का, जो कि बचपन से ही दूसरों की मदद करते आये हैं, कि उन्होंने लच्छू को अपनी सायकिल के डंडे की सवारी करवाते हुये उसे घर छोड़ा. सारे रास्ते बेचारा कराह रहा था – हाय मार डाला – चट्टान तू चूरन बन जाये – ना जाने क्या क्या बद-दुआयें दे रहा था.
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उसकी पीड़ा देख कर राजेश बाबू द्रवित होते हुये बोल दिये,” लच्छू, तुम चिंता मत करो! कल सुबह हम तुमको सायकिल पर बैठा कर सेंटर ले भी जायेंगे और वापसी में छोड़ भी देंगे.”
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दूसरे दिन लच्छू को बैठाने के लिये राजेश बाबू ने सायकिल के कैरियर पर गद्दी-वद्दी भी बाँध दी ताकि लच्छू आराम से बैठ कर जा सके. रास्ते में हमने देखा कि कैरियर पर बैठे हुये लच्छू भैया, आराम से सूक्ष्म रूप पुर्चियों को अज्ञातवास देने में लगे हुये हैं. मैं ने कहा,” अबे तुमको डर नहीं लगता है क्या! कल पकड़े गये, रस्टीकेट होते होते बचे, जम कर तुड़ैया हुयी तुम्हारी और आज फिर पुर्ची ले कर चल पड़े. पगला गये हो क्या?”
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लच्छू चिड़चिड़ा कर बोला,” अबे अकल से पैदल हो क्या ? हैं ?! कल ही पकड़ा गया हूँ और कस कर लात जूते भी खये हैं, तो लोग तो यही सोचेंगे ना कि मैं डर के मारे आज ‘साफ़-सुथरा’ आया होऊँगा, और मैं सबको चकमा दे कर अपना काम कर निकलूँगा.”
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खैर, पेपर बंटते ही चट्टान सिंह जी फिर से कमरे में आये और लच्छू की सीट के चारों ओर दो बार परिक्रमा करते हुये बोले,” लछमी परसाद...”
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”जी मास्साब !” लच्छू बिना घबराहट और हकलाहट के बोला.
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”आज भी कुछ खर्रा-वर्रा लाये हो क्या?”
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”नहीं गुरू जी, कल की मार के बाद कौन ऐसा बावला होवेगा जो फिर से खर्रा लाने की हिम्मत करेगा. अब तो मैं सारी ज़िंदगी खर्रे ना लिखूँगा गुरूजी. आपने मुझे सच्चाई का रास्त दिखा दिया है – उसी पर चलूँगा.”
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चट्टान सिंह जी प्रसन्न हुये और लच्छू के सिर पर हाथ फेर कर उसे आशीष देते हुये कमरे से बाहर जाने लगे. दरवाजे पर पहुंच कर चट्टान सिंह जी ने ‘रियलाइज़’ किया कि लच्छू के बालों से कोई चीज़ उनकी उंगलियों में फंस गयी है. चट्टान सिंह जी ने फंसी चीज को देखते हुये बोलना शुरू किया,” बायें मोजे में – ‘बालक शब्द का रूप’, कॉलर के नीचे ‘फल शब्द का रूप’, चढ़ढ़ी के अंदर ‘दीर्घ संधि’, सैंडिल के नीचे ‘मारीच उवाच का हिन्दी अनुवाद’.....”
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फिर बेचारे लच्छू की जो हालत हुयी उसे अगर यहाँ बता दिया तो मानव अधिकार संरक्षक पक्के तौर पर चट्टान सिंह जी को काला पानी की सजा करवा देंगे. इतना बता देता हूँ कि बेचारा कैरियर की सवारी करने लायक भी ना रहा और शाम को हमने उसे जस तस रिक्शे के पावदान पर ठेल कर उसे उसके घर कूरियर कर दिया.
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चलिये, इतनी रुकावटों के बावजूद लच्छू भैया ने गुड सेकंड क्लास में हाई स्कूल निपटा दिया. केवल 12 नम्बरों से उसकी फ़र्स्ट क्लास रुक गयी. कभी कभार बेचारा दुखी हो जाता और दिल भर आता तो सेंटी हो कर बोलता कि अगर चट्टान सिंह जी थोड़ा कोओपरेट किये होते तो मैं भी फ़र्स्ट क्लास में हाई स्कूल निकालता.
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इंटर करते हुये जब अधिकतर लड़के आई.आई.टी., रुढ़की, बिट्स मेसरा, एस.सी.आर.ए., धनबाद या टी.एस.’राजेन्द्र’ की प्रतियोगात्मक परीक्षाओं के फार्म भर रहे थे तो लच्छू जी ने आकर सवाल उठाया,” ये सब क्या भर रहे हो?”
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जब हमने एक्सप्लेन किया तो लच्छू बोले,” ये सब पढाई करके और नौकरी करके क्या उखाड़ लोगे? क्या 1200 – 1500 की प्राइवेट नौकरी करके आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो पाओगे? नौकरी तो ऐसी होनी चाहिये जिसमें आपको सैलरी के लिये सरकार का मुँह ना ताकना पड़े. आप खुद ही पैसे खड़े कर लें.”
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हमने पूछा,” जैसे....?”
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” जैसे भाई जल निगम, सिंचाई विभाग, नगर निगम, पी. डब्लू. डी. और हाँ, यहाँ भी इंजीनियर बनने में कोई फायदा नहीं है इसलिये मैं तो पालीटेक्निक का फार्म भरूंगा और ओवरसियर बनूँगा. आत्मनिर्भरता ही मेरा नारा है.”
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खैर, इंटर के बाद ज्यादा तर लड़के अपने अपने रास्ते चले गये और लच्छू से उसके बाद कोई संपर्क नहीं रहा. उसकी आत्मनिर्भरता की बातें अकसर याद आती रहतीं.
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पिछले माह मुंबई जाना हुआ. फ़ोर्ट स्थित सिटी बैंक के ए.टी.एम. से पैसे निकाल कर निकला तो एक खोमचे पर नज़र पड़ी – ‘चावल के दाने पर नाम लिखवाइये’. खोमचे पर पहुँच कर मैं ने कहा,” भाई, मेरा भी नाम लिखना ‘अनुराग’.” जब कारीगर पर नज़र पड़ी तो चेहरा जाना पहचाना लगा मैं ने तुक्का लगाया,” लच्छू?”
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थोड़ी देर मुझे देखते रहने के बाद लच्छू भी पहचान गया और बोला,” देखो, बचपन में उल्टी निब से छोटा छोटा लिखने का जो गुर सीखा था वो आज कैसे मेरी जीविका बन गया है. अपनी शर्त पर रहते हैं, जब मन आया खोमचा लगाया और जब मन आया उठाया – पूर्णतया आत्मनिर्भर. लाइफ़ हो तो ऐसी.”
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और इस बार भी मैं लच्छू के आत्मनिर्भरता के विचारों के सामने नतमस्तक हुये बिना ना रह पाया.
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
3:32 अपराह्न
7
टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
सूक्ष्म रूप धरि
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आत्मनिर्भरता पर विश्वास रखने वाले भारतीयों पर यदि शोध किया जाये जो मेरे बचपन के मित्र लक्ष्मी प्रसाद का नाम उस शोध पत्र में शायद सबसे ऊपर आयेगा.
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लक्ष्मी प्रसाद मेरे साथ हाई स्कूल में पढ़ता था. अगर हम ‘आधुनिक’ दौर के किसी अंग्रेजी माध्यम स्कूल में पढ़ रहे होते तो शायद लक्ष्मी को प्यार से ‘लक्खी’ कह कर बुलाते. लेकिन पुराने ज़माने के अपने स्कूल में हम उसे लच्छू कह कर बुलाते थे.
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लक्ष्मी प्रसाद या लच्छू को अपने नाम के अनुरूप, लक्ष्मी मैया का प्रसाद पूर्ण रूप से प्राप्त था. वो ऐसे, कि लच्छू के पिता जी श्री लक्ष्मी नारायण जी हमारे शहर के रजिस्ट्रार ऑफिस में बड़े बाबू थे. सुबह नौ बजे से शाम पाँच बजे तक बड़े बाबू (लच्छू के बाऊ जी) पर धन लक्ष्मी की अविरत वर्षा होती रहती.
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हमारे एक सहपाठी (और अब हमारे पड़ोसी) राजेश बाबू ने एक दिन ख़ुलासा किया कि लच्छू के बाऊ जी की पैंट शहर में केवल एक ही दर्जी सिल पाता है. हम सबने बड़े अचरज के साथ पूछा कि भैया ऐसा क्या है उनकी पैंट में कि शहर के बाक़ी दर्ज़ी उनकी पैंट ही नहीं सिल पाते हैं? तो उस पर राजेश बाबू ने बताया कि दिन भर बाऊ जी पर घनघोर धनवर्षा होने के कारण शाम तक ऐसी मोटी रकम जमा हो जाती है कि उसको रखने के लिये साधारण दर्ज़ियों द्वारा सिली गयी पैंटॉं की जेबें बहुत छोटी पड़ती हैं और इसी लिये बाऊ जी की विशेष पैंट जिसकी दाहिनी जेब घुटनों तक लम्बी होती हैं, शहर में केवल एक ख़ास दर्ज़ी ही सिल पाता है.
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राजेश बाबू ने तो उनकी जेबों के नाम भी रखे थे. दाहिनी जेब, जिसमें बाऊ जी दिन भर की मेहनत की कमाई जमा करते थे, उसका नाम था ‘लेना बैंक’ और बाईं जेब जिसमें से निकाल कर पैसे खर्च किये जाते थी उसका नाम था ‘देना बैंक’. राजेश बाबू के अनुसार दोनों जेबों में हाथ डालते समय बाऊ जी के चेहरे पर अलग अलग टाइप के भाव भी आते थे, जैसे कि ‘देना बैंक’ से पैसे निकालते समय उनके चेहरे पर ‘देवानंद’ का भाव दिखता था और ‘लेना बैंक’ में पैसा जमा करते हुये उनके चेहरे पर ‘लेवानंद’ के भाव हुआ करते थे. बाऊ जी को अपनी बाईं जेब से रोकड़ा निकालना बिलकुल भी पसंद नहीं था और उनको इससे जुड़े भाव और उस भाव के नाम ‘देवानंद’ से ऐसी चिढ़ थी कि बाऊ जी ने ताउम्र देवानंद की कोई भी फिल्म नहीं देखी. ऐसी मान्यता है कि बाऊ जी अकसर ये कहा करते थे कि यदि देवानंद के भाई विजय आनंद और चेतन आनंद अपना नाम बदल कर लेवानंद रख लें तो वो उनकी फ़िल्म कम से कम आठ दस बार अवश्य देखेंगे.
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लेकिन साहब हमारे मित्र लच्छू की भी दाद देनी पड़ेगी, ऐसे संपन्न और आर्थिक रूप से सुदृढ़ परिवार में लालन पालन होने के बावजूद भी वह समाज में अपनी एक अलग पहचान बनाना चाहता था और पिता की छत्र छाया से दूर आर्थिक, वैचारिक और शैक्षिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहता था. अपनी इस आत्मनिर्भरता के चिह्न उसने हाई स्कूल से ही दिखाने शुरू कर दिये.
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जव स्कूल से सारे लड़के खर्चे के लिये घर से ही पैसे माँगते थे, लच्छू अपने पैसे खुद कमाता था. स्कूल खुलने पर जब बाऊ जी नयी कॉपी-किताबें खरीदने के लिये लच्छू को पैसे देते तो वह नयी की जगह पुरानी किताबें खरीद लेता और बचे हुये पैसों से अपना दैनिक निर्वाह करता.
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हर शुक्रवार को हाजिरी के रजिस्टर में लच्छू के नाम के आगे मास्साब अपनी लाल पेन से, बिना उसका नाम बुलाये ही ‘अ’ यानि कि अनुपस्थित लिख दिया करते थे. वो बात असल में ये थी कि आर्थिक आत्मनिर्भरता प्राप्त करने हेतु हर शुक्रवार को, जब शहर के टॉकीज में नयी फ़िल्में रिलीज होती थीं तो लच्छू स्कूल से ‘अ’ होकर लालजी चित्र मंदिर, राजकमल चित्र मंदिर या उत्तम टॉलीज में ‘उ’ यानि कि उपस्थित होकर सिनेमा के टिकटों का ‘पाँच का दस – पाँच का दस’ करते हुये अपने दैनिक व्यय का प्रबंध कर रहे होते थे.
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वो भी क्या दिन थे साहब, जब सिनेमा की टिकटें ब्लैक में बिका करती थीं. बीबी पर एक्सट्रा इंप्रेशन डालते हुये लोग कैसे सीना फुला कर बोलते थे कि प्रिये मैंने तुम्हारे लिये ब्लैक में टिकट खरीदे हैं. पिछली लाइन के हैं – ठीक पंखे के नीचे के. आजकल ऐसा बोल कर देखिये, प्रिये तो प्रेत बन कर आप के ऊपर झपटती हुयी बोलेंगी कि मूढ़ हो जो ब्लैक में खरीदा है, ऑन लाइन बुक करवा लेते तो पैसे बचते ना! कसम से इस मल्टीप्लेक्स कल्चर ने तो सिनेमा से रोमांस ही उड़ा दिया है.
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खैर, तो इस प्रकार लच्छू ने हाई स्कूल से ही आत्मनिर्भरता का रास्ता पकड़ लिया था. यह आत्मनिर्भरता मात्र आर्थिक मामलों तक ही सीमित नहीं थी. शैक्षिक रूप से भी लच्छू ने, स्कूल के मास्साब या ट्यूशनों से दूर, प्रथम श्रेणी प्राप्त करने के लिये अपने ही प्रबंध किये थे. किसी भी महान व्यक्ति की तरह लच्छू को विद्यालय के औपचारिक और घुटन भरे वातावरण से उतनी ही चिढ़ थी जितनी कि समाजवादियों को संपन्नता से होती है.
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इधर ब्लैक बोर्ड पर मास्साब चाहे जो भी पढ़ा रहे हों, पंखे के नीचे वाली डेस्क पर बैठ कर लच्छू आगामी परीक्षा के लिये खर्रे या पुर्चियाँ बना रहा होता था. एक बार हमने पूछा कि गुरू लच्छू इम्तहान तो अभी बहुत दूर हैं तुम अभी से खर्रे बनाने में लगे हो! तो लच्छू ने हम कमअक्लों को चुप कराते हुये कहा,” एक ही जादू, कड़ी मेहनत, दूर दृष्टि, पक्का इरादा और अनुशाषन.” हम सब ठहरे मूढ़ तो लच्छू से पूछ बैठे कि भैया ई का मतलब का है? तो लच्छू ने विस्तार से बताया,” मेरे पास ‘दूर दृष्टि’ है जिसके चलते मैं भविष्य में आने वाली आपदा यानि कि परीक्षा नाम के संकट को देख सकता हूं, लेकिन मैं ने ‘पक्का इरादा’ किया है कि मैं ‘अनुशाषित’ रूप से और अभी से ‘कड़ी मेहनत’ करूँगा ताकि इस आपदा को पराजित करके विजयी हो सकूँ – यही ‘एक जादू’ है जो चलेगा. मैं तो स्कूल खुलते ही पुर्चियाँ बनानी शुरू कर देता हूँ, कभी घर चलो तो अपना कलेक्शन दिखाऊँ.” हम सब ने एकमत हो कर लच्छू से कहा कि भैया तुम कांग्रेस पार्टी में भर्ती हो जाओ – भविष्य सुनहरा हो जायेगा (उसका नहीं, कांग्रेस का !). साथ ही हमने उसके घर का रुख भी कर लिया ताकि हम उसका कलेक्शन देख सकें.
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लच्छू के घर पर हमने उनका खर्रों और पुर्चियों का कलेक्शन देखा जो कि लच्छू ने बहुत ही आर्गेनाइज़्ड तरीके से जूते के पुराने डिब्बों में सहेज कर रखा हुआ था. विषयानुसार हर डिब्बे की कलर कोडिंग थी, जैसे कि विज्ञान का डिब्बा लाल, जीव विज्ञान का पीला – वगैरह वगैरह. डिब्बे के अंदर, हर एक पाठ की पुर्चियों को अलग रखने के लिये लच्छू ने गत्ते के टुकड़े इस्तेमाल किये थे. हमने अचरज से पूछा कि भाई इतने छोटे छोटे पुर्चों में तुमने इतने डीटेल में कैसे लिख मारा? तो लच्छू ने ज्ञान दिया,” यार इतना छोटा छोटा लिखना भी एक कला है. मैं अपनी फाउंटेन पेन का चयन बहुत ध्यानपूर्वक करता हूँ. सबसे महीन चलने वाली पेन खरीदता हूँ और फिर उल्टी निब से लिख कर यह सब खर्रे बनाता हूँ.” हमने तो दाँतों तले उंगली दबा ली और श्रद्धापूर्वक लच्छू के सामने नतमस्तक हो गये. अभी हम नतमस्तक ही थे कि राजेश बाबू ने सवाल दागा,” लच्छू यार, ये सब खर्रे तो तिमाही इंम्तहान में ही यूज़ हो जायेंगे, तो फिर छमाही और फाइनल इम्तहान के लिये क्या फिर से पुर्चे बनाओगे?”
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हमारी मूढ़ता पर झुंझलाते हुये लच्छू बोला,” अरे नहीं यार! इतनी मेहनत से बनाये हुयी पुर्चियों को मैं वेस्ट नहीं करता हूँ. जब इक्ज़ाम देने जाता हूँ तो इन पुर्चियों को जहाँ तहाँ अपने ऊपर छिपा कर ले जाता हूँ. इक्ज़ाम हॉल में जब पेपर मिल जाता है तब देखता हूँ कि कौन-कौन से सवाल फंसे हैं, फिर थोड़ी देर बाद पेशाब करने के बहाने से टायलेट जाता हूं और जो भी सवाल नहीं फंसे होते हैं, उनके खर्रे वहां रोशनदान के नीचे एक ईंटे के नीचे छिपा आता हूँ. इक्ज़ाम के बाद उसे वहाँ से उठा कर फिर से बक्से में सहेज कर रख लेता हूँ.”
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इसके बाद लच्छू ने हमको अपनी दूरदर्शिता का ऐसा नमूना दिखाया कि हम तो दंग ही रह गये. उसने हमें सैंडिल के तलुए के आकार में कटे हुये कुछ खर्रे दिखाते हुये कहा,” ये देखो ! ये है मेरा बह्मास्त्र ! इन पर्चों पर वेरी वेरी इंपार्टेंट टाइप के सवालों के जवाब लिखे हैं, जो कि इम्तिहान में जरूर फंसेंगे. ये पुर्चियाँ तिमाही या छमाही इक्ज़ाम के लिये नहीं हैं. इनका इस्तेमाल सिर्फ़ फाइनल इक्ज़ाम में होगा, क्योंकि इनको रि-सायकिल नहीं किया जा सकता.”
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”रि-सायकिल ? ! मतलब ? ! और भाई ये सैंडिल के तलुए के आकार की क्यों हैं?”
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लच्छू ने बताया,” जब इक्ज़ाम हॉल में पहुंच जाऊंगा तो इन खर्रों को लेई लगा कर अपनी सैंडिल के नीचे चिपका लूँगा और फिर सीट पर बैठ जाऊँगा। पेपर मिलने के बाद देखूँगा, अगर क्वेश्चन फंसा है तो सैंडिल उतार कर उसे अपनी कॉपी के नीचे छिपा कर जवाब टेंप दूँगा और अगर क्वेश्चन नहीं फंसा है तो सैंडिल को जमीन पर रगड़ रगड़ कर सारे सुबूत मिटा दूंगा।” .
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लच्छू भैया से हम भी पूछ बैठे,” यार तुम तो पूरी की पूरी किताब को बजरंग बली की तरह सूक्ष्म रूप धारण करवा कर इम्तिहान में ले जाते हो. ये बताओ कि इसे छिपाते कहाँ हो और ये कैसे पता करते हो कि कौन सा चैप्टर कहाँ छिपाया है.”
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”यार छिपाने की तो बहुत जगह हैं, जैसे कॉलर के नीचे, कमीज के नीचे जो तुरपायी करी जाती है उसके भीतर – बत्ती बना कर. चढ्ढी के अंदर. फुल आस्तीन की कमीज की आस्तीन मोड़ कर हर एक फोल्ड में पुर्चियों की तह लगाता हूँ. रही बात कौन सी पुर्ची कहाँ है तो उसके लिये मैं एक विषय सूची बनाता हूँ और उसी हिसाब से पुर्चियाँ एडजस्ट करता हूँ. जैसे, ‘गति के समीकरण’ – बायें मोजे में, ‘न्यूटन के नियमों का सत्यापन’ – कमीज की तुरपाई में, ‘परावर्तन के नियम’ – चढ़्ढ़ी में. इस विषय सूची को मैं कॉलर के नीचे रखता हूँ और जब पेपर मिल जाता है तो विषय सूची से देख देख कर काम की पुर्चियाँ निकाल लेता हूँ.”
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मान गये ना ! !
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(क्रमशः)
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
4:47 अपराह्न
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टिप्पणियाँ
चल कहीं दूर
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पश्चिमी देशों ने भी क्या क्या चोचले बनाये हुये हैं. अब यही देखिये आज विश्व जनसंख्या दिवस है. सुन कर ही बच्चन जी की मधुशाला याद आ गयी;
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एक बरस में एक बार ही जलती होली की ज्वाला
एक बार ही लगती बाजी जलती दीपों की माला
दुनिया वालों किंतु किसी दिन आ मदिरालय में देखो
दिन को होली रात दीवाली रोज़ मनाती मधुशाला
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अब जनसंख्या का मुद्दा कोई होली, दीपावली या किसी का बर्थ डे तो है नहीं कि साल में एक ही दिन मनाया जाये। इन मुद्दों पर तो रोज ही सोचना पड़ेगा. पर भैया कौन समझाये इन मानसिक रूप से कंगाल गोरों को, कहते हैं कि साल में एक दिन मनाओ एड्स दिवस, विश्व शांति दिवस, जनसंख्या दिवस और ना जाने क्या क्या !
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इन कमअक्लों को हमसे कुछ सीख लेनी चाहिये। हमारे लिये तो जीवन एक उत्सव है और हम हर रोज जश्न मनाते हैं. हमें किसी ‘दिवस’ की जरूरत नहीं पड़ती और अगर कोई जश्न किसी दिवस का मोहताज है भी तो हम मधुशाला का रुख करते हुये दिन को होली और रात दीवाली मना लेते हैं, मतलब कि नॉन स्टॉप जश्न 24/7 एन.डी.टी.वी. की तरह.
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अब यह जनसंख्या को ही ले लीजिये, बताइये क्या हम किसी दिन का इंतज़ार करते हैं ? नहीं भाई बिलकुल नहीं, जब और जहाँ मौका मिला हम जागरूक नागरिकों की तरह जनसंख्या बढ़ाने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे ही देते हैं।
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प्रश्न यह उठता है कि जनसंख्या के प्रति हम देसी इन गोरों से इतने भिन्न और जागरूक क्यों हैं? देखिये, कई बातें हैं जैसे कि हमारा ईश्वर में आस्था रखना, बड़ों की आज्ञा का पालन करना और हमारा अपने देश, समाज और अपने परिवार के प्रति अपना उत्तदायित्व समझना।
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हम लोग धर्म और ईशवर में अटूट बिश्वास रखते हैं ! रोज सुबह शाम आरती गाते हैं, मंगलवार का व्रत रखते हैं, मंगल और शनिवार को बजरंग बली के मंदिर में सवा किलो बेसन के लड्डू का प्रसाद चढ़ाते हैं, देवी जागरण करवाते हैं, साल में एक या दो यात्रा शिरडी या वैष्णो देवी की करते हैं, तिरुपति में बाल मुडवाते हैं और इन सब का परिणाम यह होता है कि ईश्वर हमारी अटूट श्रद्धा से प्रसन्न हो कर हमको प्रसाद के रूप में नवजात शिशु दे देता है. आखिरकार, बच्चे तो भगवान की देन होते हैं ना !
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तो भाई जनसंख्या बढ़ाने के पवित्र काम में ईश्वर की भी बड़ी अनुकंपा है.
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इस पुण्य कर्म में ईश्वर के अतिरिक्त हमारे बड़े – बुजुर्ग भी हमारे साथ हैं। इधर नयी नवेली बहू ने ससुर जी के चरण स्पर्श किये और उधर ससुर जी ने हाथ उठाते हुये आशीष दिया “दूधो नहाओ, पूतों फलो”. इतना सुन कर सासू माँ कैसे पीछे रहें वो भी बहू को आशीष देती हैं “तुम्हारी गोद सदा हरी रहे, ईश्वर तुमको इतने बच्चे दे कि रात को गिन कर सोन पड़े”. अब जब बड़ों की यह इच्छा हो तो भाई नव विवाहित जोड़ी को पालन तो करना ही पड़ेगा !
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एक और बात है हमारे जागरूक होने की और वह है परिवार और समाज के प्रति हमारा उत्तरदायित्व। इसको समझने के किये मैं एक केस स्टडी नीचे दे रहा हूँ.
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हमारे घर में चौका-बर्तन करने के लिये सुषमा आती है। सुषमा को कुल मिला कर आठ बार ईश्वर का प्रसाद प्राप्त हुआ है. सबसे बड़ा प्रसाद यानि कि संतान 22 वर्ष की है और सबसे छोटी 22 महीने ही. सुषमा बहुत ही समझदार टाइप की महिला है और उसने बहुत ही सुनियोजित तरीके से अपना परिवार नियोजन या फैमिली प्लानिंग करी हुयी है.
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उनके हर बच्चे के बीच कोई एक या डेढ़ साल का अंतर है. जैसे ही संतान 16 साल की हुयी, सुषमा उसे चौका-बर्तन के काम पर लगा गेती है, 2 साल बाद उसकी शादी हो जाती है लेकिन तब तक अगली संतान शादी करने वाली संतान को ‘रिलीव’ करने के लिये तैयार हो जाती है. इस प्रकार ‘नॉन स्टॉप’ सप्लाई का चक्र चलता रहता है और सुषमा हर डेढ़ दो साल पर एक नये शिशु को जन्म दे कर यह पक्का कर लेती है कि उसके परिवार आय लगातार बंधी रहे. इसे कहते हैं परिवार नियोजन या फैमिली प्लानिंग !
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ये तो था सुषमा का पारिवारिक उत्तरदायित्व निभाना. लेकिन उसकी यह प्लानिंग मात्र उसके परिवार तक ही सीमित नहीं है. सुषमा का यह मानना है कि ‘साहिब’ लोगों के घर पर चौका-बर्तन करने वाली सस्ती, मजबूत और टिकाऊ कामवालियाँ लगातार आती रहें, इसके लिये भी वह संतान को जन्म देती है. यह रहा सुषमा का सामाजिक उत्तरदायित्व समझना.
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इसके अतिरिक्त हम संपूर्ण विश्व के भविष्य के प्रति भी बहुत जागरूक हैं। हम यह बात समझ चुके हैं कि विश्व के बहुत से देशों की जनसंख्या कम हो रही है और बची-खुची जनसंख्या वृद्धावस्था की कगार पर खड़ी है. ऐसे में आज से कुछ साल बाद उनके देश में काम करने के लिये वर्क फ़ोर्स दे सकने वाला एक मात्र हमारा हे देश होगा. हम अपने नागरिकों से उन देशों को सुचारु रूप से चलायेंगे. सारे विश्व में अपने झंडे गाड़ेगे. इससे सारे विश्व का भला होगा साथ ही साथ रेमिटेंस से भेजे गये पैसों से भारत का विदेशी मिद्रा भंडार भी बढ़ेगा. देखा, कैसे देश सेवा और विश्व सेवा एक साथ चलेगी.
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आप गोरों की इन बचकाना ‘दिवस’ वाली फिलॉसफी पर मत जाइये। साल भर जनसंख्या दिवस मनाइये. विश्व, देश, राष्ट्र, समाज और परिवार के प्रति अपने उत्तरदायित्व को एक सच्चे भारतीय की तरह निभाइये.
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आइये, जनसंख्या बढ़ाइये!
मेरे साथ नारा लगाइये !!
हम दो, हमारे सौ
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अनुराग श्रीवास्तव
द्वारा
11:36 पूर्वाह्न
5
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चल कहीं दूर