सोमवार, अक्तूबर 09, 2006

होत चीकने पात


रविवार की अलसाई दोपहर में मै कुछ देर ऊंघने का प्रयास कर ही रहा था, कि मेरे दस वर्षीय सुपुत्र ने आकर झंझोंक कर जगा डाला, ”पापा, आप अपने ब्लाग पर मेरी एक कविता डाल सकते हैं?”

अपने देश के संस्कार या भाषा अपनी अगली पीढ़ी को ना दे पाने की ग्लानि इस प्रसन्नता के नीचे दबा दी कि चलो भाई लेखन ना सही, कम से कम यह ब्लगोड़ापन तो अगली पीढ़ी को सौंप पाये!

चिहक कर बोले,” सुनाओ बेटा, ज़रूर छापेंगे।“

गला खखारते हुये साहबज़ादे शुरू,

“उसकी आंखों में आंसू
आंसू में पानी
पानी में खो गये हम
हो गये सुनामी

दस सेकंड में डूबा तेरा दिल
तेरा दिल…”

गीत सुना कर वह प्रश्नवाचक दृश्टि से मुझे देखते हुये मेरी प्रतिक्रिया का इंतज़ार करने लगा। बीबीजी बड़े गर्व से, मुस्की मारते हुये अपने सपूत पर निहाल हुये जा रही थीं।

हमने एक प्रभावशाली भारतीय पिता की तरह अपनी हतोत्साहिक भौंक निकाली,”यह क्या बकवास है! ऊट पटांग कवितायें बनाते हो? कुछ शर्म-ओ-हया है कि सब बेंच खाये हो?” बेचारा बेआबरू हो कर हमारे कूचे से निकल ही रहा था कि हमने अपनी ए के 47 फिर दागी,” तुमने लिखी है?”

“नहीं, मेरे स्कूल में एक लड़के ने सुनाई है।“

“तुमने नहीं लिखी?”, मेरी गर्जना तेज़ हुई।

“ “

“तो तुमने यह क्यों कहा कि ‘मेरी’ कविता छाप दीजिये?”, ये डायलाग तो इतनी ऊंची 'पिच' में था कि अगर हिन्दी फ़िल्मों में होता तो बैक ग्राउंड में बिजली कड़कने की आवाज़ जरूर डाली जाती।

“मैं ने थोड़े चेंजेस किये हैं, एक वर्ड चेन्ज किया है, तो फिर मेरी ही हो गयी ना।“

सुनते ही, मेरी तो बाछें खिल गयीं, सीना फूल कर 48 इंच का हो गया, बेटे का सुनहरा भविष्य साफ़ दिखाई देने लगा। लपक कर उसे सीने से लगा लिया, सर पर हाथ फिराते हुये उसे आशिर्वाद दिया,” जियो बेटे, एक दिन तुम खानदान और देश का नाम बहुत ऊंचा करोगे!! शाबास।“ < नासिर हुसैन इश्टाइल>

फिर बीबीजी से मुखातिब हो कर बोला,” देखा! आखिर बेटा किसका है!!” <बैकग्राउड़ में गाना 'वो तो है अलबेला, हज़ारों में अकेला, सदा तुमने ऐब देखा हुनर को ना देखा'>

बीबीजी अचरज में, “ अजीब इंसान हो तुम! जब वह कह रहा था कि मैं ने लिखी है तो भौंक रहे थे, अब जब वह कह रहा है कि टोपो मारी है तो आशिर्वाद दे रहे हो?”

दार्शनिक अंदाज़ में मैं ने कहा,” भविष्य में देख सकने की दिव्य शक्ति सबके पास नहीं होती, मैं जो देख रहा हूं वह तुम नहीं देख पा रही हो।“

“साफ़ साफ़ बताओ!”

“इसके लक्षणों से साफ़ ज़ाहिर है कि एक दिन यह हिंदी फ़िल्म की दुनिया में अपना कीर्ति पताका लहरायेगा।“

“?”

“अभी से यह दूसरे की रचनाओं को थोड़ा फेर बदल करके अपना बता रहा है, सोचो आगे चल कर हाँलीवुड की फ़िल्मों में थोड़ा बहुत फेर बदल करके कितनी धाँसू धाँसू फ़िल्में बनाएगा “टैक्सी नम्बर 9211”, “एक अजनबी” और ना जाने कितनी, सब की सब सुपर हिट और क्रिटिकली अक्लेम्ड।“

“हां, ये तो सही कह रहे हो, बेटा टैलेन्टेड तो है।“ बीबीजी ने उसके सर पर हाथ फिराते हुये गर्व से निरुपा राय की तरह कहा।

“और अगर फ़िल्में चुराने का मन ना करे तो टाँप संगीत कार बनने का एक और रास्ता है – दिन भर इसको एम टी वी दिखाया करो। आगे चल कर उन्हीं धुनों पर ढ़ोलक और तबला पीट कर एक अच्छी सी इंस्पायर्ड और पूर्णतया भारतीय या फ़्यूज़न या कन्फ़्यूज़न धुनें तैयार कर सकता है।“

“तो फिर बेचारा कन्नू मलिक क्या करेगा?”

“अरे, वो ट्रैफ़िक लाइट पर खड़ा हो कर हमारी गाड़ी के शीशे पर झाड़न मरेगा, और क्या! हम तो इसको ऐसा महान टोपो मास्टर बनायेंगे कि कन्नू मलिक जैसे 50 – 60 मिल कर भी इतनी धांसू इंस्पिरेशन (नकल) ना ले पायें।“

“ख़्याल तो बहुत बढ़िया है!”

“हां, और इस क्षेत्र में विकल्प भी बहुतेरे हैं, अगर संगीतकार भी ना बनना चाहे तो री-मिक्स एलबम बना सकता है। बेचारे पंचम दा ने सारी जिंदगी पसीना बहा बहा कर कर्ण प्रिय संगीत इसी लिये तो बनाया था कि हमारी दिवालिया पीढ़ी उनका कलात्मक बलात्कार करके हमको परोसती रहे और स्वयं री-मिक्स किंग की उपाधि से अलंकृत हो कर नोट खसोटती रहे।“

बीबीजी की आंखे खुल गयीं, बेटे से बोलीं,” ये मैथ्स की बुक अलमारी में वापस धरो, चलो – एम टी वी देखो - और हाँ आज से नो कार्टून नेटवर्क एण्ड नो डिज़्नी चैनल - ओनली एम टी वी!“

हम भी बेटे के सैटल हो जाने की खुशी से अपने सारे टेंशन छोड़ कर दोपहर को इत्मिनान से सोये।

शाम को जब आलू-प्याज़ लेने सब्जी मण्डी जा रहे थे, बीबीजी ने पचास डालर का पत्ता हाथ में पकड़ाते हुये कहा,” सारी लेटेस्ट इंगलिश फ़िल्मों की डी वी डी ले आओ। बच्चे के भविष्य के लिये अब हमें संजीदगी से सोचना चाहिये।“

हाथ में सब्जी का झोला टांगे, कल्पना रथ पर सवार हो आंखों में ऐश्वर्या राय से मिलने का सपना सजाये, सब्जी मण्डी की ओर पैर बढ़ाते हुये, बाँलीवुड की सैर पर निकल पड़े।

(घटनायें एवम् पात्र पूर्णतय: काल्पनिक हैं।)

अनुराग श्रीवास्तव
09 अक्टूबर 2006

7 टिप्‍पणियां:

संजय बेंगाणी ने कहा…

पूरी बत्तिसी निकालते हुए आपके लाडले को आशिर्वाद दे रहा हूँ. भगवान आपकी सारी मनोकामनाएं पूर्ण करे.
आप तो छाते जा रहे हो.

Sameer ने कहा…

आपको और आपके लाडले को सुनहरे बॉलीवूडी भविष्य की ढ़ेरों शुभकामनायें.

-सही जा रहें हैं, जारी रखें.

जगदीश भाटिया ने कहा…

बहुत अच्छे अनुराग जी, बच्चे की हौसला अफजाही करते रहें।
सच बहुत अच्छा लिखा है।

अनूप शुक्ला ने कहा…

बढिया है. अच्छा लगता है आपके लेख पढ़ना.

DR PRABHAT TANDON ने कहा…

तो देर काहे ही अनुराग भाई, जल्दी से एक ब्लागर पर उसका भी एकाउन्ट खोल दें, लिखने दें उसको अपने मन की बातें .

Shrish ने कहा…

ओ जी बोत सई। हम तो कहता हूँ उसका एक ब्लॉगवा खुलवाई दो। कॉपी-पेस्ट विधि से काम और आसान हो जाएगा, ई ही तो फायदा है कम्प्यूटरवा भईया का। हाँ :)

बेनामी ने कहा…

Which came first? chicken or the egg