बुधवार, फ़रवरी 07, 2007

चायनीज़ भोजन - चुन्नू, मुन्नू और मैं

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बचपन में एक चुटकुला सुना था.
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दो हिन्दुस्तानी लड़के चुन्नू और मुन्नू घूमने के लिये चीन जाते हैं. चुन्नू और मुन्नू को चीनी भाषा नहीं आती है. घूमते फिरते चुन्नू और मुन्नू को बड़ी कस कर भूख लगते है, तो दोनो एक रेस्टोरेंन्ट में खाना खाने जाते हैं, और जस-तस वेटर को इशारे से ही समझा देते हैं कि भैया हमें बड़ी ज़ोर की भूख लगी है, कुछ खाने-वाने के लिये ले आओ.
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थोड़ी देर में वेटर दो प्लेटों में खाना लाकर चुन्नू और मुन्नू के आगे सरका देता है और दोनो भूखे बड़े चाव से खाना खाने लगते हैं. खाना बड़ा चटपटा और मजेदार था, स्वाद लेते हुये चुन्नू भाई बोले,” यार मुन्नू इसने मुर्गी बड़ी बढिया बनाई है.” यह सुन कर मुन्नू ने कहा,” यार, बनाई तो बढ़िया है लेकिन यह मुर्गी नहीं बकरी है.”
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इस बात पर दोनों दोस्तों में बहस हो गये, एक बोले ‘मुर्गी’ तो दूसरा कहे ‘बकरी’. कुछ देर झगड़ने के बाद दोनों दोस्तों ने कहा कि यार क्यों बे-फिज़ूल का झगड़ा करें, चलो वेटर को ही बुला कर पूछ लेते हैं. इशारे से वेटर को बुलाया गया और इशारे से ही चुन्नू ने मुर्गी की आवाज़ निकालते हुये पूछा “कुक ड़ू कू”. वेटर ने इशारे से सिर हिलाते हुये कहा “नहीं”. अब, अपने मुन्नू भाई बहुत खुश हुये और उन्होंने अपनी बात सिद्ध करने कि लिये बकरी की आवाज़ निकाली “मेंएंएं मेंएंएं” लेकिन वेटर ने फिर मुंडी हिला कर कहा “नहीं”.
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चुन्नू और मुन्नू बड़े हैरान! खैर, इशारे से ही पूछा “कि भाई फिर यह क्या खिला दिया?” तो अपने वेटर महाशय ने आवाज़ निकालते हुये कहा “ढ़ेंचू ढ़ेंचू”.
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चुटकुला सुन कर हम खूब हंसते थे, इस बात से पूरी तरह अनभिज्ञ कि एक दिन ऐसा ही कुछ मेरे साथ भी घटित होगा और वह भी चीन में ही.
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पिछले साल एक वाणिज्य जल पोत का निरीक्षण करने के लिये मैं थाईलैण्ड के श्रीराचा बंदरगाह गया. मूल कार्यक्रम यह था कि 3 या 4 दिन बाद वापस सिंगापुर आ जाऊँगा, लेकिन वहाँ जाने के बाद निर्देश मिले कि हमारी ही कम्पनी का एक दूसरा जहाज चीन के निंगबो बंदरगाह पर आ रहा है और मुझे उसका भी निरीक्षण करना है.
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तो हमने अपना झोला लपेटा और चल पड़े निंगबो. श्रीराचा से बैंकॉक और हॉगकॉग होते हुये 28 जनवरी 2006 को शाम 6:30 बजे हम पंहुच गये निंगबो. आप सोच रहे होंगे कि मुझे तिथि इतने पक्के तरीके से कैसे याद है? वैसे तो मेरी यात्राओं की तिथियाँ मुझे कभी भी याद नहीं रहती पर यह वाली इसलिये याद है क्योंकि गत वर्ष 26 जनवरी को “चीनी नव वर्ष” था, जो कि चीनी मूल के लोगों का सबसे महत्वपूर्ण पर्व है.
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निंगबो पहुंच कर सामान पेटी पर गया, देखते ही देखते सबका सामान आ भी गया और लोग अपना सामान लेकर निकास द्वार से निकलते गये. हम टकटकी लगाये उन्हें देखते रहे. काँच की दीवार के पार बाहर खड़े लोग साफ दिख रहे थे. स्वजन और परिवार जन अपने अपने आगंतुक को लेकर चलते बने. दीवार के पार एक सज्जन हाथ में गत्ते की एक तख़्ती लिये खड़े थे जिस पर मोटे मोटे अक्षरों में लिखा था “Capt. Srivastava”. बेचारे की ड्यूटी लगी थी, हमको हवाई अड्डे से होटल छोड़ने की – वह भी नव वर्ष वाले दिन. सोचिये जरा, अगर दीपावली की शाम हमें भी ऐसे ही जाना पड़े तो दिल पर क्या गुज़रेगी.
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हमारे ड्राइवर साहब बाहर बड़ी बेचैनी से चहल कदमी कर रहे थे – उनकी बेचैन चहल कदमी चीख चीख कर कह रही थी “अबे जल्दी बाहर निकल, मुझे घर जाना है”. और इधर हम फंसे थे कि हमारा सामान नहीं आया था. खैर, स्थल कर्मचारियों से सामान ना आने की शिकायत दर्ज़ करवायी और बाहर आ कर चल पड़े निंगबो शहर.
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होटल पंहुच कर हमने जैसे ही कार के बाहर पैर रखा, ड्राइवर साहब कार लेकर उड़न-छू हो गये. हमने चेक इन किया, नहाये-धोये और फिर सोचा कि शहर में थोड़ा टहला मारा जाये. खैर साहब शहर की सारी दुकानें, सारे रेस्टोरेंट बंद थे. सड-अकों पर खूब जोरदार आतिशबाज़ी हो रही थी. रॉकेट, चटाईयाँ, बम चुड़ाई जा रही थीं, पूरा दीपावली वाला महौल था – धूम-धाम!
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भूख लगी तो वापस होटल का रुख किया. होटल के रेस्टोरेंट में गये. वहाँ लोग अपने परिवार के साथ (नव वर्ष में पूरा खानदान इकठ्ठा होता है और साथ ही खाना खाता है) खाने आये हुये थे. इतनी भीड़ कि मानो मुफ्त में खाना बांटा जा रहा हो.
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हमने भी आगे बढ़ कर कहा,” Hi! Table for one please.”
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परिचायिका ने मुझे देखा और कहा,”You alone, may be wait long. No seat. Seat full.”
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“No problems, I’ll wait.”
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“Long waiting. You stay hotel.”
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“Yes, I’m staying in the same hotel.”
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“Then no wait, may be you no eat restaurant, may be you eat room.”
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“No, I don’t like to eat in the room, it’s so very boring (ऊपर से टीवी पर सारे चैनल भी चायनीज़ में आ रहे हैं), I’d rather wait and dine in here.”
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“Ahhh, I see. May be you wait room, when seat empty I tell and you come and you eat.”
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यह सुझाव मुझे पसंद आया तो मैं ने अपने कमरे का नम्बर युवती को बता दिया और कमरे में आ कर बालकनी से खड़े हो कर आतिशबाज़ी के नज़ारे लेने लगा. करीब 45 मिनट बाद फोन घनघनाया, ”Sir, now empty seat may be you eat.”
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हम लदड़ भदड़ करते हुये रेस्टोरेंट में पंहुचे. परिचायिका महोदया मुझे ले चलीं. मैं ने सोचा कि अभी किसी टेबल पर बैठा देंगी, लेकिन टेबल पार करके वो मुझे ले जाकर VIP Room में बैठा दीं. (दक्षिण पूर्वी और पूर्वी देशों में अधिकतर रेस्टोरेंट और बार में VIP Rooms होते हैं, जहाँ आप हाहुओं की तरह आराम से बैठ कर खा सकते हैं).
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अब यह VIP Room हमारे हिसाब से कुछ ज्यादा ही बड़ा था, 21 कुर्सियों वाले कमरे में अकेले बैठने में भी डर लग रहा था. खैर चीन की हरी चाय से स्वागत हुआ और फिर waitress महोदया ने मेन्यू पेश किया. अब क्योंकि यह काफी परंपरागत चीनी खाना परोसने वाला रेस्टोरेंट था सो हमने सोचा कि यहाँ पर अपना food adventure करने में खतरा हो सकता तो हमने कहा,” Sea food.”
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“ 我不瞭解 ”
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“fish, prawns, shrimps, lobster….”
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“我不瞭解 “

“Sea food….sea food.”
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जब उन्हें मेरी बातें समझ में ना आयीं तो उन्होंने अपनी एक सखी को बुलाया. मैं ने फिर कहा,” “fish, prawns, shrimps, lobster….”
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“Ahhh, Lobster. OK!”
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“Yes, lobster.”
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“What style lobster”
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अब एक हिन्दुस्तानी के लिये तो चाईनीज़ खाना दो या तीन ही स्टाइल का होता है “मंचूरियन”, “शेज़वान” या फिर “स्वीट ऐण्ड सॉर”. सो हमने कहा,”मंचूरियन”
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“Ahh, sorry we make no Manchurian style. May be you like eat local style!!??”
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“Yes, local style, I want local style, sounds good!!”
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“You want with ‘lice’ or no ‘lice’?”
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हलांकि हम ने यह समझ तो लिया कि उच्चारण के चलते भद्र महिला ‘rice’ को ‘lice’ बोल रही हैं, फिर भी खतरा उठाने की हिम्मत नहीं पड़ी. मान लीजिये जो सुनाई दे रहा था वही आ जाता तो हम भी चुन्नू-मुन्नू की तरह नप जाते. सो हमने ‘सेफ प्ले’ करते हुये कहा, “ No ‘lice’ only lobster.”
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दो मिनट के अंदर ही हमारा खाना आ भी गया. हम तो भैया बड़े खुश हुये – क्या धुंआ धार सर्विस है. खाना आया भी बड़े शाही अंदाज़ में. मेरे बायीं तरफ से एक वेट्रेस ने खाने का थाल मेरे सामने रखा और दाहिनी ओर खड़ी वेट्रेस ने बड़ी नज़ाकर से मुस्कुराते हुये थाल का ढक्कन हटाया.
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ढ़क्कन के हटते ही थाल का जो नज़ारा दिखा, तो मन किया कि कुर्सी से कूद कर भाग निकलूं. पर भाई विदेश में थे तो अपने देश की इज्जत का ख्याल रखते हुये जमे रहे मैदान में.
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थाल की सजावट बड़ी धांसू थी, गाजर, लेट्यूश, मूली वगैह की कालीन से थाल ढ़का था और कालीन के ऊपर लाब्सटर!
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इस लाब्सटर को क्या कहूं समझ में नहीं आ रहा है – ‘अधजिंदा’ या ‘अधमरा’. जिंदा लाब्सटर को बीच से काट कर उसका ऊपरी भाग मोड दिया गया था, नीचे के हिस्से का गूदा ‘स्कूप आउट’ करके एक छोटी सी प्लेट में नीबू की फाँकों के साथ सजा दिया गया था. बेचारे में अभी भी थोड़ी सी जान बाकी थी सो रह-रह कर उसके डैने हिल रहे थे, और काफी देर तक हिलते रहे.
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ढ़क्कन हटाने के बाद दोनों महिला “Enjoy” कह कर बाहर चली गयीं. मेरे सामने एक अधमरा – कच्चा लाब्सटर छोड़ कर कि लो भैया – सी फ़ूड खाओ.
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बड़ी मुश्किल कि क्या करें, खैर थोड़ा सा खाया मगर हरी चाय से गुटक गुटक कर. फिर घंटी बजा कर वेट्रेस को बुलाया और कहा कि एक और डिश लाओ. उसने पूछा क्या तो हमने कहा “क्रैब”.
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दो मिनट बाद क्रैब भी आ गया इस बार जिंदा तो नहीं था लेकिन कच्चा और जमा हुआ (फ्रोज़न) – हमारा संघर्ष चल ही रहा था और शायद कन्यायें इसे समझ गयीं तो आ कर खुद ही पूछ लिया,” May be we fry for you.”
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“Yes, yes….” मारे खुशी के हमारे मुंह से केवल दो ही शब्द निकले.
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जब तक हमारा खाना तलने के लिये गया, एक वेट्रेस ने आ कर कहा,” Today China new year, all hotel staff make special food. We offer everyone that. May be you also eat – we make dumplings.”
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“Sure, I’d love to try that.”
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थोड़ी देर के बाद तला हुआ लाब्सटर और क्रैब दोनो आ गये और साथ में ड्म्पलिंग्स भी. स्वादिष्ट होने के बावजूद भी लाब्सटर और क्रैब मेरे गले के नीचे नहीं उतरे देखते ही उसके हिलते हुये डैने याद आते रहे और मेरी हिम्मत नहीं हुयी, खैर, मैं ने मुफ्त की डम्पलिंग्स खाकर ही पेट भरा.
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उस दिन चुन्नू-मुन्नू वाला चुटकुला बहुत याद आया, लेकिन हंसी बिलकुल नहीं आयी.

12 टिप्‍पणियां:

जगदीश भाटिया ने कहा…

भैया, विदेश में हिंदुस्तानी पानी के बताशे बहुत याद होंगे।
विदेश में जो कुछ खाना पड़ता है उसे आप मजबूरी कहेंगे या एडवेंचर?
आंखों देखा विवरण अच्छा रहा। ढेंचू ढेंचू से तो बेहतर ही रहा डिनर :)

Shrish ने कहा…

अच्छा एडवेंचर था। ये लाब्सटर होता क्या है, कोई समुद्री जीव ?

आपका तो फिर भी शुक्र है, हम तो एक बार अपने ही देश में ठगे गए।

परिचारिका कि इंग्लिश मजेदार थी।

आशीष ने कहा…

ये चायनीज और जापानी खाना सही मे बहुत बडा एडवेंचर होता है। मैने सुसी(जापानी डीश) का नाम काफी सूना था। एक बार खाने की कोशीश की , पता चला की सूसी मछली को चावल से साथ कच्चा ही परोसा जाता है।
फिर क्या था, सामने के मैकडोनाल्ड मे जाकर चिकन बर्गर खाया :)

संजय बेंगाणी ने कहा…

मौका आने पर भी चीन जाने के बारे में दो बार सोचुंगा :)

Manish ने कहा…

बताइए हम जैसे शाकाहारियों का क्या होगा !

Udan Tashtari ने कहा…

डम्पलिंग्स- यह कौन सी डिश होती है? बाकि का एडवेंचर मजेदार रहा. राईस मंगा लेते, कम से कम पेट तो भर जाता. :)

अनूप शुक्ला ने कहा…

मजेदार !

अतुल श्रीवास्तव ने कहा…

अपने साथ भी ऐसी ही दुर्घटना घटी जब न्यूज़ीलैंड में लाल लाल रंग की टमाटर वाली करी का ऑर्डर दे बैठे - पहले ही कौर के बाद पता चला कि वो tripe थी. ऐसी सड़ी बदबू थी कि दो दिन तक कुछ खाया ही नहीं गया. वैसे विविध प्रकार के खाना ट्राई करने में मैं महारथी हूँ. कभी इथियोपियन खाना मिले तो जरूर से खाना - लज़ीज़!

Tarun ने कहा…

गनीमत मानिये कि समुद्री जीव ही मिले खाने को, ये तो और भी ना जाने क्या क्या पकाते और खाते हैं।

अनुराग श्रीवास्तव ने कहा…

निंगबो एक छोटी जगह है और वहाँ भाषा की दिक्कत के कारण ऐसा हुआ. मैं इसके पहले भी 2-3 बार चीन गया हूं, लेकिन वह सारी यात्रायें शंघाई की थीं. शंघाई में अच्छी खासी अंग्रेजी बोली जाती है और इसी कारण वहाँ ऐसी दिक्कत नहीं आयी.

वैसे चाइनीज़ खाना बढ़िया होता है और मुझे काफी पसंद भी है – हां भाई ‘निंगबो लोकल स्टाइल’ – ना बाबा ना.

@ जगदीश: क्या पता भैया – कभी किसी यात्रा में ढ़ेंचू ढ़ेंचू या भौं भौं भी खा चुके हों. 4 महीने कोरिया में भी रहा हूं ना!! खैर वो कहानी फिर कभी.

@ श्रीश: भैया माफ़ करना, लाब्सटर को हिन्दी में क्या कहते हैं मालूम नहीं, आमची मुम्बई में भी सारे रेस्टोरेंट वाले लाब्सटर ही कहते हैं. वैसे ब्लॉग पर फोटो लगा दी है.

@ आशीष: जापानी खाना तो मैं बड़े चाव से खाता हूं – कच्चा खाने से मुझे कोई परहेज नहीं है (ऑयस्टर तो कच्चे की खाये जाये हैं) लेकिन जिंदा खाना - कुछ ज्यादा ही हो गया ना!

@ संजय और मनीष: चीन में अपने देशी और शाकाहारी रेस्टोरेंट भी हैं लेकिन छोटी जगहों पर नहीं हैं. वैसे मौका मिले तो चीन जाइयेगा जरूर – वहां पर विकास “दिखाई” देता है, महसूस होता है. बहुत तरक्की कर गये हैं.

@ उड़न तश्तरी: समीर जी, ‘राइस’ की जगह ‘लाइस’ आ जाता तो सोचिये क्या हाल होता! ‘डम्पलिंग्स’ वही जो ‘वॉनटॉन’ सूप में गुझिया जैसे पड़े रहते हैं. मैंने उससे यह नहीं पूछा कि इसमें भरा क्या है – भगवान जाने क्या जवाब मिलता ! वैसे थे बहुत बढ़िया.

@ अनूप: हुम्म! आपको मज़ेदार लगा, ठीक है अगली बार जब लखनऊ आना होगा तो हम दोनो साथ में चलेंगे, कैसरबाग़ के मछली बज़ार और वहीं बैठ कर खाना-वाना होगा. :-)

@ अतुल: अफ्रीका के कई देशों में बहुत बढ़िया खाना मिलता है. वैसे मिस्त्र, तुर्की और ग्रीक खाना भी बढ़िया होता है.

@ तरुण: मैं ने भी इस प्रकार की काफ़ी भयावह कहानियाँ सुनी हैं - वैसे सिंगापुर में मेंढक की टांगें कई बार खा चुका हूं. सिंगापुर वाकई “Food Heaven” है.

Aflatoon ने कहा…

निंगबो के बारे में और जानने कि उत्सुकता है।भौगोलिक स्थिति-दक्षिण पूर्वी तट? हाँग-काँग के निकट?शहर में साइकिल चालकों(जिनकी संख्या के लिए चीन की प्रसिद्धि थी) की स्थिति?उपभोक्तावाद की हालत?नेट पर सुना है काफ़ी रोक है?बिना नेट से जुड़े वहाँ भी आप न रहे होंगे।

rachana ने कहा…

हा हा!! lice!!अयिययिय्यो!! ऐसे खाने के बारे मे पढने पर ही हालत खराब हो गई..लेकिन आप लिखते ही इतना अच्छा हैं कि मरते(पढते) क्या न करते! कि तर्ज पर पढ्ना ही पडता है.