बुधवार, अक्तूबर 04, 2006

नगर में माँल

जब भारत वर्ष के समस्त नगरों में ज़मीन के भाव आसमान चूमने लगे, तो भवन निर्माताओं ने अपनी दया दृश्टि हमारे शहर की ओर घुमाई, और इस प्रकार, गत वर्ष हमारे शहर में एक अदद शांपिंग माँल का आगमन हुआ।

भुक्ष नगर वासियों को तो मानो जैसे छप्पन पकवानों से सुसज्जित थाल मिल गया हो, सारे नगरवासी, अपने समस्त परिवार जनों के साथ, ऐसे उमड़े मानो वहां भारत और पाकिस्तान का एक दिवसीय क्रिकेट मैच होने वाला हो, या मानो जगत नारायण स्वयं अवतरित हो गये हों। पूछिये मत, श्रद्धालुओं का तांता लग गया। कोई कार में चढ़ा चला आ रहा है, कोई सायकिल खींचते हुये चला आ रह है - जिसमें पीछे कैरियर पर श्रीमतिजी गोद में एक बच्चा लिये बैठी हैं और आगे डंडे पर एक बच्चा और विराजमान है, कई जोशीले मुस्तंन्ड़े नगर बस की खिड़कियों में लगे सिखचों लटक लटक कर पहुंचे (इसके दो लाभ हैं - एक तो टिकट नहीं खरीदना पड़ता है दूसरे बस के अन्दर पसीने की बदबू का जो भभका रहता है उसे भी नहीं झेलना पड़ता है) और, जिनके पास विलास के इन मंहगे साधनों का व्यय वहन करने की क्षमता नहीं थी, वो श्रद्धालुगण लम्बी लम्बी पेंगे भरते हुये मांल तक की सड़क नापते हुये ही निकल पड़े।

देखते ही देखते छूत की यह बीमारी सारे शहर में फैल गयी। अब इस बीमारी का कोई टीकाकरण तो उपलब्ध था नहीं कि हम खुद को बचा पाते। फिर इस कीटाणु ने हमारे परिवार के सभी सदस्यों के इच्छा द्वार पर दस्तक दे ही डाली। एक दिन खाने के समय श्रीमतिजी ने मेरी मनपसंद आलू की सूखी सब्ज़ी और पनीर परोसी, मुस्कुरा कर पूछीं, "कैसी बनी है?"

"उम्म ! बहुत बढ़िया बनी है", मैने खाने का मजा लेते हुये कहा।

खुशी से उनके आगे के चार दांत झलक पड़े। थोड़ा रुक कर घबराते हुये पूछ बैठीं, "कभी माँल घूमने चलें?"

उनकी घबराहट का कारण यह था कि मेरे जैसा जन्म-जात कंजूस, माँल का नाम सुनते ही, कहीं पागल कुत्तों की तरह उनको दौड़ा कर काट ना खाये। उन्हें क्या पता था कि मैं भी माँल रोग से ग्रसित था, मैनें झट से कह दिया,"कल चलते हैं।"

उनकी सारी बत्तीसी फिर बाहर," थोड़ी पनीर और लीजिये ना ।" शादी के बाद पहली बार श्रीमतिजी ने इतने प्रेम और समर्पण से भोजन परोसा और खिलाया, मैने भी कुछ ज़्यादा ही खा लिया, बाद में बच्चों के लिये खाना कम पड़ गया, ख़ैर माँल दर्शन की आस में उन्हें एक रात भूखे सोना भी मान्य था।

मैं भारत वर्ष के उस कथित उन्नतशील एवम गतिशील मधयम वर्ग का प्राणी हूं, जिनके पास एक चौपहिया वाहन होता है। दो साल पहले मैनें एक 'वैगन आर – एल एक्स आई' खरीदी थी, अब पता नहीं कि उसे किस नाम से पुकारूं, हमारे नगर की सड़कों पर चलने वाले टाटा सुमो और महिन्द्रा मार्शल, जिनको हम "मैक्सी कैब" कहते हैं और, तीन पहियों पर लुढ़कते हुये विक्रमों ने मेरी नयी नवेली का ऐसा चीर हरण किया कि बेचारी बाल्यावस्था से सीधी वृद्धावस्था में ढ़नग पड़ी। ऐसी दुर्गति हो गयी है कि मारुति-सुज़ुकी के विशेषज्ञ भी उसे पहचानने से मुकर जाते हैं। मेरे कुछ अनिभिज्ञ मित्र जो हमारे शहर के यातायात से भली भांति परिचित नहीं हैं कभी कभार पूछ लेते हैं," भैया क्या ' डी सी' (दिलीप छाबरिया) का किट लगवाया है गाड़ी में, बड़ी धांसू लग रही है? " सुन कर, नगर के यातायात संबंधी उनके सामान्य ज्ञान पर तरस आता है, और अपनी गाड़ी की दशा पर रोना।

खैर, अगले दिन श्रीमतिजी ने मुझे चालक की सीट पर धकेला, पीछे की सीट पर अखण्ड रामायण के लाउड स्पीकरों की तरह लगातार बजने वाले दोनों बच्चों को ढ़ूंसा और बड़ी अदा से मेरी बगल वाली सीट पर बैढ़ते हुये बोलीं - चलो चलो, जल्दी चलो। पुरुष धर्म के अनुसार स्त्री आज्ञा निभाते हुए, मैने कार को सड़क पर धकेल दिया।

रास्ता ढ़ूंढ़ने में कोई ज़हमत नहीं करनी पड़ी, मालुम था जिधर सारे लोग जा रहे हैं वही रास्ता माँल को जाता होगा। ढ़ाई किलोमीटर की दूरी को करीब 30 मिनट में पूरा करते हुये, अंतत: हम माँल पहुंच ही गये। अनंत श्रद्धालुओं की ऐसी भीड़ कि अगर कुम्भ का मेला यह नज़ारा देख ले, तो शायद वह भी चुल्लू भर पानी तलाशने लगे। श्रद्धालुओं की आंखों में विस्मय तथा श्रद्धा का भाव देख कर ऐसा प्रतीत होता था, कि माँल- दर्शन के फलस्वरूप वो जीवन म्रित्यु के अनंत चक्र से मुक्त हो यहीं मोक्ष प्राप्त कर लेंगे।

अखण्ड रामायण के लाउड स्पीकरों की तरह लगातार बजने वाले दोनों बच्चों की आवाज़ जब काफ़ी देर तक नहीं सुनायी पड़ी तो मैंने कनखियों से पीछे देखा, दोनों के जबड़े विस्मय से ऐसे लटक रहे थे मनो कि घुटनों को छू लेंगे। टकटकी लगाये माँल के भवन को निहारे जा रहे थे। श्रीमतिजी का भी कुछ ऐसा ही हाल था। और हम अपने भाग्य को कोंस रहे थे, जन-सिंधु के बीच में गाड़ी हांकते हुये, हम जी भर कर माँल को देख भी नहीं पा रहे थे। यकीन मानिये अगर पीछे से आ रहे गाड़ी वाले जोर-जोर से हार्न ना बजा रहे होते, तो मैं सड़क के बीच में ही गाड़ी खड़ी कर पहले जी भर कर माँल को देखता, फिर आगे बढ़ता।

गाड़ी आगे बढ़ाते हुये मैं कनखियों से सड़क के दोनों ओर पार्किंग तलाश करने लगा कि कहां पर गाड़ी घुसेड़ूं, दो चक्कर लगाने के बाद भी जब पार्किंग के लिये स्थान ना मिला तो श्रीमतिजी ने झुंझला कर कटाक्ष किया," बाहर से ही परिक्रमा करते रहोगे या भीतर चल कर साक्षात दर्शन भी करवाओगे?"

मैं भी चिड़चिड़ा कर बोला," पार्किंग तो मिले, या यहीं सड़क पर ही गाड़ी छोड़ दूं !"

"लो पापा को तो मालुम ही नहीं," मेरे गंवारपन का ढ़िंढ़ोरा बच्चों के सामने पीटती हुयी बोली," माँल में ही भूमिगत पर्किंग है, बिलकुल फ़ारेन कन्टरी की तरह, पच्चिस रुपये में पार्किंग मिल जाती है!"

“पच्चिस रुपये!?," मैंने विस्मित होकर कहा,"सारे शहर में तो पांच रुपये में होती है!!" " चक्कर लगा लगा कर पचास रुपये का तेल फूंक दोगे लेकिन पार्किंग के पच्चिस रुपये नहीं दोगे!"

श्रीमतिजी की बात में दम था, अत: मैने गाड़ी माँल की पार्किंग की ओर मोड़ दी, लेकिन प्रवेश द्वार पर पहुच कर पाया कि "पार्किंग फ़ुल" का बड़ा सा तिख़्ता झूल रहा है। बड़ी मुशक्कत के बाद मैने पाया कि थोड़ी दूर पर, सड़क के किनारे, गाड़ियां कतार बद्ध तरीके से खड़ी थी। चाचा चौधरी की तरह मेरे दिमाग में तर्क कौंधा कि हो ना हो यहां नयी पर्किंग शुरू हो गयी है। बस, मैंने निचोड़ते हुये अपनी गाड़ी को यदा कदा वहां घुसेड़ ही दिया।

"पार्किंग वाला कोई दिख नहीं रहा है।," श्रीमतिजी ने प्रशन किया।

"चिंता ना करो, यहीं कहीं होगा, आ जयेगा बाद में। अब समय ना व्यर्थ करो, चलो चलते हैं।"

हमारे शहर का यह 'रिवाज़' है, गाड़ी खड़ी करने के समय आपको टोकन देने के लिये कोई नहीं आएगा, लेकिन जब आप गाड़ी निकालने आएगे तो आपकी गाड़ी में बा कायदा टोकन लगा मिलेगा, जी हां टोकन का वह हिस्सा जो आपके पास होना चाहिये, वह भी गाड़ी में लगा दिया जाता है। और जैसे ही आप गाड़ी निकालेंगे, 13-14 साल का एक लड़का पार्किंग शुल्क के पांच रुपये लेने के लिये, सहसा प्रकट हो जायेगा।

हमने निश्चिंत होकर अपनी गाड़ी खड़ी करी और चल दिये माँल घूमने।

5 टिप्‍पणियां:

Pratyaksha ने कहा…

मॉल कथा अच्छी लगी

अतुल श्रीवास्तव ने कहा…

पढ़ कर मजा आ गया. "ख़लीफ़ा तरबूजी" (के.पी. सक्सेना) की शैली में लिखा है. मैं तुम्हारे ब्लॉग की कड़ियाँ अपने ब्लॉग पर डालने जा रहा हूँ.
- दादा.

संजय बेंगाणी ने कहा…

मुआ मॉल न हुआ एश्वर्या राय हो गई जो सारा शहर देखने उमड़ पड़ा. खैर आपने मॉल-दर्शन लाभ लिया हैं उसका भी समय रहते विवरण देना न भूलें. हम भी फोकट में थोड़ा पुण्य कमा लें.

हितेन्द्र ने कहा…

अति सुंदर।

Shrish ने कहा…

अच्छी 'मॉल-कथा' थी। इस के अंत में आपको कुछ इस तरह लिखना चाहिए था।

"बाकी अगले अंक में जारी..."

हम समझे कि बिना क्लाइमेक्स के कहानी खत्म हो गई। फिर देखा कि भाग २ भी है।