बुधवार, अक्तूबर 04, 2006

माँल की सैर

गाड़ी पार्किंग में ठूंस कर हम माँल देखने चल पड़े।

मुख्य प्रवेश द्वार पर, जेबें और झोले टटोल टटोल कर सभी श्रद्धालुओं की तलाशी ली जा रही थी। पास ही एक सूचना पट पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा था “परिसर के अन्दर पान या पान मसाला ले जाना तथा उसका सेवन करना दण्डनीय है। पकड़े जाने पर पाँच सौ रुपये जुर्माना” मुझे बड़ा गुस्सा आया, यह तो हमरे शहर की परम्परा के पूर्णतया विरुद्ध है। हमारे शहर में तो कहा जाता है;

“कुल का दिया पूत है
महफ़िल का दिया गान
आँखों का दिया सुरमा
मुँह का दिया पान।“

पाश्चात्य सभ्यता का अंधा अनुकरण करने वाले ‘इन’ जैसे भारतीयों के कारण ही हमारी महान एवम विश्व विख्यात भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अस्तित्व आज संकट में है। मैंने ठान ली कि जब मेरा नम्बर आएगा तो मैं इन्हें कस के झाड़ूँगा, देखता हूं कैसे रोकते हैं मुझे! लेकिन कतार में खड़े खड़े मैंने देखा तमाम गाली गलौज और झगड़ा करने के बावजूद लोगों के पान मसाले के पाऊच जब्त कर लिये जा रहे थे।

अब तो मेरे गुस्से ने घबराहट का रूप लेना शुरू कर दिया। आने से पहले मैं ने पूरे पाँच रुपये खर्चा करके गुटखा के चार पाऊच खरीदे थे, अगर जब्त हो जाते तो पाँच रुपये का भयंकर नुकसान हो जाता। नुकसान की सोच, मेरा दिल जोर जोर से धक धक करने लगा (हलाँकि मेरी धक-धक काफ़ी तेज़ थी लेकिन माधुरी दीक्षित की धक-धक के आस पास बिलकुल नहीं थी) मैं ने आव देखा ना ताव, झट-पट चारों पाऊच खोले सर ऊँचा आसमान में उठा कर, पाऊच का सारा मसाला अपने मुँह में खाली कर डाला। मेरा यह अंदाज़ देख श्रीमतिजी से रहा नहीं गया मुस्किया कर बोलीं,” बिलकुल अमीर खान लग रहे थे, सर उठता है तो पान मसाला खाने के लिये।“

हमने मुस्कुराते हुये अपनी जबान से सारा मसाला खिसका खिसका कर अपने बायें गाल के नीचे अडजस्ट कर लिया। इस तरह सुरक्षा गार्ड की आँखों में धूल झोंक कर हम माँल में घुस ही रहे थे कि उनकी नज़र हमारे सूजे हुये बाँये गाल पर पड़ी, उसने चेतावनी भरे लहज़े में कहा,”थूकने पर 500 रुपये फाइन है!”

“ओ के फाइन ऐन्ड थैन्क यू फार टेलिंग।“हमारी अंग्रेजी सुन कर वह समझ गया कि हम शिक्षित लोग हैं और बिना आना कानी करे उसने हमें जाने दिया।

अन्दर घुस कर तो हम अवाक् रह गये! आप तो शायद मानियेगा भी नही यदि मैं आपसे कहूं कि पूरे का पूरा भवन वातानुकूलित था, जी हाँ फुल ए सी। और तो और साफ़ सुथरा था - कूड़े का कोई नाम-ओ-निशान तक नहीं था। ऐसा लगा कि बिना टिकट, पासपोर्ट और वीज़ा के 'फारेन' पँहुच गये हों।

हमने श्रीमतिजी के कानों में फुसफुसा कर कहा," कितने टन का ए सी लगा होगा और सोचो तो बिजली का बिल कितना आता होगा?"

श्रीमतिजी ने ज्ञान वाणी में कहा," आइंदा जब घर में बिजली जाएगी तो यहीं आकर बैठा करेंगे।"

ऊपर नीचे आने-जाने के लिये स्व-चलित सीढ़ियाँ लगी थीं, सुना है अंग्रेजी में उन्हें 'एस्केलेटर' कहते हैं। यह मुफ़्त झूला चढ़ने के लिये लम्बी कतार लगी हुई थी, अब चूंकी हम फैमिली के साथ थे तो हम कतार में ना लग, सीधा सीढ़ी के पास जा पंहुचे। सीढ़ी पर चढ़ने ही वाले थे कि कतार बद्ध हुजूम में से कुछ असभ्य से लोगों ने चिल्ला कर कहा," अरे लाइन में आइये भाई साहब, हम लोग भी आधा घंटे से (लाइन में) लगे हुए हैं।" एक सभ्य व्यक्ति की तरह, उनकी असभ्यता को अनसुना और अनदेखा कर हम सीढ़ी चढ़ने ही वाले थे कि एक सुरक्षा गार्ड ने हमारे आगे डंडा पेलते हुये कहा बड़े रूखे अंदाज़ में कहा," चलिये, लाइन में लगिये!"

“फैमिली के साथ हैं……"

"तो क्या हुआ? लाइन में आइये।"

यकीन मानिये बहुत बुरा लगा। दूसरों का, विशेषतौर पर महिलाओं तथा बच्चों सम्मान करना हमारे देश की संस्कृति का अभिन्न अंग है। हम भारतवासियों ने सदा ही अपनी इस संस्कृति का आदर किया है, परंतु माँल में युवा पीढ़ी द्वारा इसका इस तरह अनादर होता देख कर बड़ी पीड़ा हुई। इस युवा पीढ़ी के हाथों तो देश का भविष्य अंधकारमय ही लगता है।

घिसट घिसट कुछ 20 मिनट बाद हमारा नम्बर आया, लेकिन हमारे आगे खड़े महोदय की अर्धांगनी सीढ़ी के पास पँहुचते ही घोड़ी की तरह बिदक गयीं। चलती सीढ़ियाँ देख ऐसे घबरायीं जैसे कसाई देख बकरा घबराये है, उस पर पैर ही ना रखें। उनके पतिदेव अनाड़ी घुडसवार की तरह उन्हें हाँके पड़े थे, "अरे चढ़ो!"

"पाइरवा फंस जइहे तो!?"

"नहीं फंसिहै, चढ़यो तौ!"

"हमके डर लागत है!"

"कुच्छौ नाहीं होई, चलौ।"

उनकी अखंड रामायण को बीच में ही रोक कर मैं चिल्ला पड़ा,"अरे चलो भाई हम भी 30 मिनट से लाइन में खड़े हैं - हमारा भी नम्बर आने दीजिये, या तो आगे बढ़िये या फिर साइड हटिये।"

मेरी चीख सुन महिला तो, बगल में लगी परम्परागत सीढ़ियों की तरफ़ लपक पड़ीं और रोमांचक प्रवृत्ति के उनके पति शान से स्व-चलित सीढ़ियों पर चढ़ लिये।

हमने भी जीवन में पहली बार आटोमेटिक सीढ़ियों की सवारी करी और पहली बार दिल से यह लगा कि अखबार ठीक लिखते हैं कि भारत विकास के मार्ग पर तेजी से अग्रसर है।

हलाँकि, इस बात को हम थोड़ी देर के लिये भूल गये कि 20 मिनट इंतज़ार करने की जगह हम 2 मिनट में ही ऊपर की मंज़िल पर पँहुच जाते।

माँल में दुकानों का साइज़ भी खासा बड़ा था और ताज्ज़ुब की बात यह थी कि किसी भी दुकान में शटर नहीं लगा हुआ था। मैं सोच में पड़ गया कि ये लोग रात को दुकान बढ़ाते कैसे होंगे, बिना शटर के तो कोई भी रात को दुकान में घुस कर चोरी चकारी कर सकता है।

माँल के अन्दर ज़्यादातर सिले-सिलाये कपड़ों की ही दुकानें थीं। पहली बार मुझे पता चला कि शाहरुख खान, प्रीती ज़िन्टा और तमाम हीरो-हीरोइनों की टी-शर्ट पर जो “गैप”, “ओल्ड नेवी”, “अरमानी” वगैरह लिखा रहता है, वह दर-असल कपड़ा बनाने वाली कम्पनियों के नाम हैं। यह भी पता चला कि “एफ़ सी यू के” भी कपड़ा बनाने वाली कम्पनी का नाम है, मैं तो हमेशा यही समझता था कि यह आज के युवा वर्ग की सड़ी हुई सोच और अंग्रेज़ी भाषा के सीमित ज्ञान का परिणाम है कि वह अंग्रेज़ी भाषा के एक अपशब्द की गलत स्पेलिंग अपनी टी-शर्ट पर लिखे घूमते रहते हैं।

इतनी देर घूमने के बाद हमें थुकास लगी, चार पैकेट गुटखा खाने के बाद थूकना तो ज़रूरी हो ही जाता है, आदतन हमने अपनी गर्दन थोड़ी आगे निकाली होठों को गोल बनाया और पिचकारी छोड़ने ही वाले थे कि श्रीमतिजी ने पीछे खींचते हुये कहा,” अरे क्या कर रहे हो? सठिया गये हो क्या? पाँच सौ रुपये का फाइन है!”

हमारी पान मसाले की पीक को ‘पीक प्रेशर’ पर ऐसे ब्रेक लगा जैसे टेक आँफ़ के लिये भागते जहाज़ को कोई ब्रेक लगा दे। अब जैसे ब्रेक लगाने पर जहाज़ चीं-चीं करता हुआ रनवे से थोड़ा खिसक जाता है वैसे ही रोकते रोकते भी मेरे मुँह से पीक की आठ-दस बूंदे मेरी ठुड्डी पर लुढक गयीं। मौके की नज़ाकत को देखते हुये, मारे घबराहट के मैं ने तुरंत अपनी कमीज़ की आस्तीन से अपना मुँह पोंछ लिया।

मुँह में इतनी पीक भरी थी कि हम चाह कर भी कुछ बोल नहीं पा रहे थे तो हमने इशारों से ही श्रीमतिजी से पूछा कि कहां थूकूँ? एक आदर्श भारतीय नारी की तरह वह तुरंत हमारी पीड़ा समझ गयीं। बच्चों की पानी की बोतल का ढ़क्कन खोलती हुई बोलीं,” लो इसी में थूक दो।“ मैंने एक पतली सी धार बनाते हुये अपने मुँह का सारा टेँशन बोतल में उतार दिया।

आज समझ में आया कि हमारे देश में स्त्री को देवी का दर्जा क्यों दिया गया है, इतिहास साक्षी है कि हर कदम पर इस देश की महिलाओं ने ही अपनी सूझ-बूझ और दूर दर्शिता से हम पुरुषों के मान-सम्मान की रक्षा करी है।

थुकास की बेबसी को मद्देनज़र रखते मैं ने यह फ़ैसला किया कि अब हमें माँल से निकल लेना चाहिये और घोषणा करी कि हम लोग शर्माजी के ठेले पर जा कर भर पेट चाट चापेंगे।

किन्तु विधि को कदाचित कुछ और ही मंज़ूर था। बच्चों ने माँल में मैक डाँनल्ड की दुकान की झलक पा ली थी, बस फैल गये," शर्माजी की चाट कौन खयेगा! हमतो मैक डाँनल्ड के बर्गर खाएगे।" इसके पहले कि मैं अपना रौद्र रूप उन्हें दिखाता, श्रीमतिजी ने उनका साथ देते हुये कहा,"खिला दो ना, बच्चे कहाँ रोज़ रोज़ जिद करते हैं।" प्रजातंत्र है, तीन के आगे मैं अकेला क्या करता - तुरंत घुटने टेक दिये।

सौ रुपये प्रति थाल (मैक डानल्ड में 'थाल' को 'मील' कहते हैं) के दर से हमारे परिवार के चारों सदस्यों ने कुल चार सौ रुपये फूँक कर सैम चाचा के देश का वडा पाव खाया। हाँ, साथ में कोला का शर्बत और आलू की तली हुई फाँके भी थी। चार सौ रुपये में तो शर्माजी अपना पूरा ठेला हमारे मुँह में ठूंस देते और चलते समय एक बीड़ा सौफ़िया पान दे कर सलाम भी करते।

श्रीमतिजी भी अपने फ़ैसले पर बहुत दुखी सी लग रही थी। चलते समय उन्होंने अक्लमंदी का काम किया, बची हुई पेपर नैपकिन लपेट कर अपने पर्स में ठूंस लीं, मौका ताड़ कर मैने भी इधर-उधर देखते हुए टोमाटो साँस के बचे हुए पाउच अपनी जेब के सुपुर्द कर दिये। ऐसे 'खुफ़िया' तरीके से साँस चेंपते हुए मन बड़ा पुलकित हुआ। अचानक ना जाने कहाँ से मेरे कानों में जेम्स बाँड की 'थीम ट्यून' का रोमांचक संगीत गूंजने लगा, हर जगह मात खाये एक आम हिन्दुस्तानी के लिये अचानक कुछ कर गुजरना एक बहुत ही बड़ी उपलब्धि है, मेरा आत्मविश्वास अचानक सातवें आसमान पर था, मेरी चाल में थकान की जगह 'बाँड' की ताज़गी थी ("ब्रुक बाँड" की नहीं "जेम्स बाँड" की), आँखों में 'मिशन कामयाब' होने की चमक थी , एक अह्सास था कि 'हमें लूटने चले थे - उल्टा हमने ही लूट लिया' और एक तसल्ली भी थी कि चलो दो दिनों तक बच्चों के टिफ़िन में रखने के लिये नैपकिन और साँस का जुगाड़ हो गया।

हवा में लहराता, होठों पर कामयाबी की मुस्कान चिपकाये मैं बाहर आया। श्रीमतिजी पहले ही बाहर आ चुकी थीं, मैं बाँड की तरह अपनी इस नायिका की ओर बढ़ा सोचा, जब नज़रें मिलेंगी तो हम एक दूसरे को एक मिशन कामयाब होने की एक 'मिस्टीरियस स्माइल' देंगे और हाथ थाम कर अगले मिशन के लिये आगे बढ़ चलेंगे।

जैसे ही उनके पास पँहुचा, उन्होंने कर्कष धवनि का पत्थर फेंका," अंदर झाड़ू पोंछा करने लगे थे क्या? इतनी देर से बाहर इंतज़ार कर रही हूँ।"

एक ही पल में जेम्स बाँड की 'थीम ट्यून' के रोमांचक संगीत की जगह मेरे कानों में दुखिया सारंगी गूंजने लगी। जेम्स बाँड की अर्धनग्न, मुस्कुराहट बिखेरती, कामुक नायिका के स्थान पर साढ़े पाँच गज की साड़ी लपेटे, आँखों से शोले निकालती, रौद्र रूप धारण कर मेरी श्रीमतिजी विद्यमान थीं। एक ही पल में मैं अति गौर वर्णीय, अंग्रेजी भाषी, अजेय और ब्रिटिश नागरिक जेम्स बाँड के सर्वोपरि स्थान से गिर कर एक काला-कलूटा, हिन्दी भाषी, थका हारा हिन्दुस्तानी बन गया। काँच से बना मेरा स्वप्न महल खनखन करता ढ़ेर हो गया।

सारा मूड आँफ़ हो गया!

मैं ने घूर कर श्रीमतिजी को देखते हुये कहा," हाँ, हाँ ठीक है! चलो घर वापस चलते हैं।" और गाड़ी की ओर चल पड़े।

4 टिप्‍पणियां:

नितिन बागला ने कहा…

बहुत खूब...मस्त विवरण लिखा है
:)

संजय बेंगाणी ने कहा…

अति आनन्द की प्राप्ति हुई भैये. हास्यरस पिलाने के लिए साधूवाद.

आशीष ने कहा…

बहुत अच्छे अनुराग भाई !
मजा आ गया !

Shrish ने कहा…

वाह वाह ! मॉल-कथा का भाग २ और भी मजेदार था।