सोमवार, अगस्त 27, 2007

आओ पकाएँ, कुछ कर दिखाएँ - 3

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रक्षा बंधन के अवसर पर, आइये आज सीखते हैं "बम्बइया राजमा" बनाना. वैसे तो रेसिपी चुराई हुयी है. इस पकाऊ पकवान के मूल खानसामे हैं साजिद खान, जिन्होंने ये रेसिपी रेडियो सिटी पर सुनाई थी.
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आवश्यक सामग्री:
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1. महारानी – 1
2. राजकुमार – 1
3. राजकुमार का गरीब लेकिन सच्चा मित्र – 1
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कहाँ से प्राप्त करें:
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वैसे तो साजिद खान ने यह नहीं बताया कि इन्हें कहाँ से प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन मेरे ख़्याल से मनमोहन देसाई की हिट फ़िलम “धरम-वीर” से ये सारे निकाले जा सकते हैं.
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बनाने की विधि:
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वीर एक बहुत बड़े साम्राज्य का राजकुमार है. वीर का एक सच्चा और अच्छा मित्र है - धरम. धरम एक निर्धन लोहार का पुत्र है. निर्धन होने के बावजूद, धरम बहुत ही ईमानदार, देशभक्त और खुद्दार व्यक्ति है. धरम और वीर एक दूसरे को बचपन से ही जानते हैं. वो एक साथ खेले और बड़े हुये हैं.
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दोनों मित्रों को अपनी सच्ची दोस्ती पर बहुत नाज़ है और वो अक्सर गाना गाते हैं - सात अजूबे इस दुनिया में आठवीं अपनी जोड़ी, तोड़े से भी टूटे ना ये धरम-वीर की जोड़ी.
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एक दिन राजकुमार अपने गरीब (लेकिन सच्चे) मित्र को राजमाता से मिलवाने के लिये राजमहल लाता है. राजमहल में पहुँच कर, धरम राजमाता को भी अपनी दोस्ती के बारे में गा कर बताता है - दुख सुख के हम साथी हैं ये वादा है. इस पर वीर कहता है - अपना जो कुछ है सब आधा आधा है.
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इस पर धरम सेंटी हो कर गाता है - सब कुछ आधा आधा है तो, जब ये सच्चा वादा है तो, रानीमाँ मुझको भी ममता मिल जाये थोड़ी. यह सुन कर राजमाता के सीने में छिपा माँ का दिल ममता से भर उठता है. राजमाता को धरम में अपना खोया हुआ बेटा दिखने लगता है (इस खोये हुये बेटे के बारे में किसी को पता नहीं है, उसे फिल्म की पहली रील में ही जीवन, प्राण या के.एन.सिंह टाइप के बंदे ने गायब कर दिया था) . उनकी आँखें अश्रुपूरित हो उठती हैं और वह सिंहासन छोड़ कर धरम को गले से लगाती हुयी बोलती हैं - बेटा मैं तेरी माँ हूँ बेटा, तू मुझे राजमाता या रानीमाँ मत बोला कर, सिर्फ़ माँ बोला कर बेटा. बोलो बेटा - माँ.
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यह सुन कर धरम असमंजस में पड़ जाता है. उसके हृदय में द्वंद शुरू हो जाते हैं. एक जिम्मेदार नागरिक के होते महारानी को राजमाता बुलाना ही उचित है और यही तो राज्य का नियम भी है कि आम जनता महारानी को राजमाता कह कर संबोधित करे. लेकिन राजमाता हठ पकड़ लेती हैं कि नहीं तुम तो मुझे बस माँ कहो.
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राजहठ के आगे किसकी चली है? राजमाता धरम से कहती हैं कि वह उन्हें माँ कह ही संबोधित करे. ऐसे में बीरबल के समान चतुर वीर, समस्या का ऐसा हल बताते हैं कि राजमाता और मित्र दोनो की ही बात रख ली जाती है. वीर धरम से कहता है,” राज के नियमानुसार तुम ‘राज’ अवश्य लगाओ और माँ के आदेशानुसार तुम उन्हें सिर्फ़ माँ कहो – तो आज से तुम उनको राजमाँ कह कर बुलाया करो.
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तो लीजिये तैयार हो गया राजमा. शान से खाइये और मेहमानों को खिलाइये.
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बताइएगा अवश्य कि कैसा लगा.
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पूरब से सूर्य उगा, फैला उजियारा.
जागी हर दिशा दिशा, जागा जग सारा.
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राष्ट्रीय पकाऊ अभियान - चलो पकायें, कुछ कर दिखायें.

6 टिप्‍पणियां:

अभय तिवारी ने कहा…

शानदार शाहकार..!!

अफ़लातून ने कहा…

कच्चा नहीं है यानी पका हुआ !

Sagar Chand Nahar ने कहा…

बहुत पकाते हैं आप :(

:)

Udan Tashtari ने कहा…

हा हा...ले डूबोगे सबको क्या....


तीन दिन के अवकाश (विवाह की वर्षगांठ के उपलक्ष्य में) एवं कम्प्यूटर पर वायरस के अटैक के कारण टिप्पणी नहीं कर पाने का क्षमापार्थी हूँ. मगर आपको पढ़ रहा हूँ. अच्छा लग रहा है.

Shrish ने कहा…

हा हा, पूरे लेख के अंत में एकदम हँसी आई। क्या कमाल की फेंकते हैं आप भी। :)

प्रवीण त्रिवेदी...प्राइमरी का मास्टर ने कहा…

अरे बाप रे!!!! मैं तो सच में पानी के बताशे में कोई रेसिपी पढने आया था !!
चलिए कोशिश करेंगे , पर यह मिलेगा कहाँ ????


प्राइमरी का मास्टर का पीछा करें